राजनीति का नया ट्रेंड, जनेऊ बना बड़ा ब्रैंड -दलित नेताओ को भी दी जाए राहुल गाँधी की तरह जनेऊ-परंपरा का वाहक होने की इजाज़त

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✒-सुरेश खटनावलिया
राहुल के जनेऊ धारक होने का पता चला जब कांग्रेस के आधिकारिक प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने बताया कि वे जनेऊ धारक पक्के हिन्दू है हालांकि  मैंने कभी राहुल गांधी की जनेऊ नहीं देखी पर शायद अब नेताओं में अपनी-अपनी जनेऊ दिखाने की होड़ लग जाए और अगर अब आपको यू-ट्यूब पर यज्ञ-हवन या किसी न किसी और बहाने से नेता अपना कुर्ता उतार कर छह पल्ली जनेऊ का प्रदर्शन करते हुए दिखें तो आश्चर्य मत कीजिएगा। सवाल यह भी है कि राजनीति के नए दौर में जनेऊ की विरासत का मालिक किसे माना जाएगा? क्या रामविलास पासवान, उदित राज, प्रकाश आंबेडकर जैसे दलित नेताओं को भी राहुल गांधी की तरह जनेऊ-परंपरा का वाहक होने की इजाज़त मिलेगी, जिसका  वे काफी अर्से से इंतजार कर रहे। वैसे नई पौध में भी कुछ अवसरवादी दलित अपनी महवकांक्षा की पूर्ति की हिंदुत्व के ठेकेदारों  की परछाई में पोषण का ख्वाब पाले है। इनकी इच्छाओं की पूर्ति होगी!  वर्तमान में आरएसएस व बीजीपी के  दलित के घर भोजन व स्वरगोविंदम कार्यकर्मो में दलितों को अतिथि बनाने के एजेंडों पर गौर किया जाय तो आने वाले दिनों में दलितों के भी उपनयन व जेनेउ संस्कार होना अतिशयोक्ति नही होगी।
खैर, पिछले तीन बरस में भारतीय राजनीति ने लंबा सफ़र तय कर लिया है – अब क्रोशिए की जालीदार टोपी नहीं बल्कि कंधे पर पड़ा मोटा जनेऊ भारतीय राजनीति का नया फ़ैशन स्टेटमेंट है। जनेऊ को फ़ैशन स्टेटमेंट बनाने में हालांकि कई तरह की चुनौतियां और ख़तरे भी हैं। ये क्रोशिए की वो जालीदार टोपी नहीं है जिसे पहनकर पिछले ज़माने में अर्जुन सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव जैसा कोई भी नेता ख़ुशी-ख़ुशी इफ़्तार पार्टियां दिया करता था और उसे उनकी धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफ़िकेट माना जाता था। जनेऊ की ख़ास बात ये है कि आम तौर पर वो तब ही नज़र आती है जब पहनने वाला उघारे बदन पूजा-अर्चना और हवन करता हुआ दिखे या उसे कान में लपेटकर लघु या दीर्घ शंका का निवारण कर रहा हो या फिर कोई उसके संस्कार को ललकार दे।
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की जनेऊ-धर्मिता का रहस्योद्घाटन तब हुआ जब उनके हिन्दू संस्कारों को ललकारा गया।वो भी गुजरात के करो-या-मरो वाले चुनावों के ऐन बीच में जब वो सोमनाथ मंदिर के दर्शन करने गए थे।
राहुल गांधी ने भी अपनी जनेऊ के रहस्य पर से ख़ुद पर्दा नहीं उठाया। उनकी ओर से ये काम कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके किया  उन्होंने भारतीय जनता पार्टी को छिप कर वार करने वाली कायर पार्टी बताया और पत्रकारों को इस रहस्य से अवगत करवाया कि “न केवल कांग्रेस  उपाध्यक्ष राहुल गांधी  हिन्दू धर्म से हैं, परन्तु वो जनेऊधारी हिन्दू हैं।” ये ऐलान करते वक़्त लाखों करोड़ों जाटव, रैगर, मेघवाल, वाल्मीकि, खटीक, निषाद, जीनगर सहित दलित  नौजवानों की तरफ़ सुरजेवाला का ध्यान भी नहीं गया होगा जिन्हें वर्ण व्यवस्था में जनेऊ पहनने की इजाज़त ही नहीं है। दशकों पहले आर्यसमाज ने दलितों को जनेऊ पहनाने और गायत्री मंत्र पढ़ने के लिए आंदोलन चलाया था, पर वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थकों ने ऐसा होने नही दिया। लेकिन अब सत्ता पर काबिजगी के लिए सब संभव हो चला है।
सोनिया गांधी  के बाद ‘सेक्युलर’ कांग्रेस के सबसे बड़े नेता की ‘उच्च-वर्णीय’ हिन्दू पहचान के इस खुले ऐलान से नागपुर में बैठे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अधिकारियों के कानों में निश्चित तौर पर रस घुल गया होगा। केशव बलिराम हेडगेवार से लेकर मोहन भागवत तक संघ के अधिकारियों की तमाम पीढ़ियां पिछले नौ दशकों से इसी दिन का इंतज़ार कर रही थीं। उनका नारा भी है: जो हिन्दू हित की बात करेगा, वही देश पर राज करेगा।
यानी अगर कल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी भी ऐलान कर दें कि वो प्रतिदिन प्रात:काल गायत्री मंत्र का जाप करके ही अन्न का दाना अपने मुंह में रखते हैं, या भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के डी राजा व्यवस्था दे दें कि नवरात्रियों को सभी पार्टी काडर पूरे देशभर में नौ के नौ दिन व्रत रखेंगे, तो उम्मीद की जा सकती है कि शायद संघ उनके प्रति भी नरमी बरतना शुरू कर दे। राहुल गांधी  के जनेऊधारी होने (कोई नहीं जानता कि वो वाक़ई जनेऊधारी है भी या नहीं) को कांग्रेस एक तमग़े, एक राजनीतिक प्रतिघात की तरह पेश कर रही है, वो दरअसल हिन्दू हित की संघ परिवार वाली परिभाषा में एकदम फ़िट बैठता है। इससे संघ को कोई ऐतराज़ नहीं होगा।
हिंदुहित सर्वोपरि
संघ को ऐतराज़ और भय उस हिंदू विचार से लगता था जिसका प्रचार बिड़ला भवन की प्रार्थना सभाओं में हर शाम मोहनदास करमचंद गांधी किया करते थे। नाथूराम गोडसे के हाथों उनकी हत्या से दस दिन पहले यानी 20 जनवरी 1948 को मदनलाल पाहवा ने महात्मा गांधी  की प्रार्थना सभा में बम विस्फोट किया था। तब गांधी  ने कहा था कि इस नौजवान (पाहवा) के पीछे जो संगठन हैं मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि हिन्दू धर्म को आप ऐसे नहीं बचा सकते। उन्होंने कहा, “मेरा तो दावा है कि जो काम मैं कर रहा हूं हिन्दू धर्म उससे ही बचेगा।”और सुरजेवाला को ये ग़लतफ़हमी है कि राहुल गांधी  के जनेऊ की मोटाई बताकर कांग्रेस नरेंद्र मोदी से हिन्दुत्व की राजनीतिक पहल छीन सकती है। लगता है राहुल गांधी  को भी एहसास हो गया है कि देश पर राज करने के सपने देखने हैं तो हिन्दू हित की बात तो करनी ही होगी। उनके लिए इफ़्तार की दावत में मुसलमानों की जालीदार टोपी पहनकर सामने आने की बजाए ख़ुद को जनेऊधारी हिन्दू बताना ज्यादा आसान और लाभकारी लगता है। तो क्या आप गुजरात चुनावों के दौरान राहुल गांधी  और कांग्रेस  के किसी भी नेता से नरोदा पाटिया या बेस्ट बेकरी जाकर 2002 के दंगों में कुचल दिए गए मुसलमानों का हाल जानने की उम्मीद करते हैं?
आरएसएस की बिसात
आरएसएस ने बिसात बिछा दी है और राजनीतिक हिंदुत्व का एजेंडा सेट कर दिया है। अब संघ की बिछाई इस बिसात पर टिके रहने भर के लिए कांग्रेसी  नेताओं को ख़ुद को संघ-दीक्षित नेताओं से बड़ा हिन्दुत्व का पैरोकार साबित करना होगा। आरएसएस के प्रखर प्रचारक रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने जिस राजनीति की शुरुआत की है उसमें मुसलमान वोटर हाशिए पर है। अब होड़ ‘हिन्दुत्व’ के प्रति निष्ठा दिखाने की है। इस राजनीतिक बिसात में नरेंद्र मोदी बेखटके विचरण करते हैं और जैसे चाहें वैसे अपने मोहरे चलते हैं। उनको जब मन आता है राजनीतिक बहस को क़ब्रिस्तान-श्मशान की ओर मोड़ देते है।जब चाहें पंडित जवाहरलाल नेहरू को सोमनाथ मंदिर के विरोधी की तरह पेश कर देते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए जालीदार टोपी पहनने से इनकार कर चुके मोदी जब चाहते हैं तो विदेशी मेहमानों को अहमदाबाद की मस्जिद दिखाने भी ले जाते हैं पर ये सब को किसी राजनीतिक दबाव में नहीं अपनी शर्तों पर करते हैं पर दूसरे कोने से मुग़लों को इतिहास की किताबों से मिटा देने की या फिर ताजमहल को तेजो महालय शिवमंदिर साबित करने मुहिम ज़ोरों से चल रही होती है
जब हिन्दुत्व की ये होड़ यहां तक पहुंच ही गई है तो राहुल गांधी  इस विमर्श को और आगे बढ़ा सकते हैं। जिस तरह वो अपने कुत्ते पिद्दी को बिस्किट खिलाने के वीडियो सोशल मीडिया पर जारी करते हैं, कल्पना कीजिए अगर उसी तरह चुटिया बढ़ाए, तिलक लगाए, उघारे बदन, मोटी जनेऊ पहने दुर्गा सप्तशती या शिवस्त्रोत का सस्वर पाठ करते हुए अपना वीडियो यू-ट्यूब पर अपलोड कर दें तो देश की राजनीति कैसी होगी कल्पना कीजियेगा!
इसलिए…..
न मस्जिद को जानते हैं,
न शिवालो को जानते हैं ‘साहेब’
जो भूखे पेट हैं,
वो सिर्फ निवालों को जानते हैं……

क्या सामाजिक संस्थाओ में पदाधिकारियों का चयन चुनाव प्रक्रिया के द्वारा होना चाहिए ?

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