बहुजन, मूलनिवासी, अम्बेडकराइट्स और दलित…!

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मेरे वजूद को, अपने दामन से झाड़ने वाले,
     जो तेरी आख़िरी मंजिल है, वो मिट्टी हूं मैं….।

-सुरेश खटनावलिया

दलित शब्द को लेकर काफी समय से इस तबके बीच बहस छिड़ी हुई है। दलित थिंक टैंक का मत है कि यह शब्द दलितों के लिए उपयुक्त नहीं है, इससे हीन व तिरस्कार के भाव उत्पन्न होते है। इस संदर्भ में उनका तर्क है कि बाबा साहेब भी इसे उपयुक्त नही मानते थे। इसलिए उन्होंने संविधान में  इस शब्द की जगह ‘अनुसूचित’ शब्द का उपयोग किया है। वैसे देखा जाय तो दलित का शाब्दिक अर्थ हिंदी व्याकरणानुसार दरिद्र, शोषित या दबा कुचला माना गया है। मीडिया और समाज ने भी इसे यही संज्ञा दी है। लेकिन आज इस शब्द की दो परिभाषाएं समाज में स्थापित हो रही है। एक तरफ जातिवादी और घृणित, संकुचित समझकर इस शब्द से कुलीन लोग दूरियां बना रहे है और दूसरी तरफ इसी शब्द से वही तिरस्कृत और वंचित समाज संगठित भी हो रहा है। जिससे इस शब्द को मजबूती मिल रही है।


काबिले गौर हो कि दलित का अर्थ दल+हित होना चाहिए जो बहुत सरल संधि विच्छेद भी है और सही अर्थ भी है। लेकिन हिंदी के ज्ञानी इसमें खामियां जरूर निकालेंगे मगर हरिजन शब्द का जंब सीधा अर्थ छोटी जाति बताया जाता तो उन्ही ज्ञानियों का ज्ञान थोड़ा कम पड़ जाता है। हालांकि  दल से राजनीति का तात्पर्य नही होना चाहिए बल्कि दल एक संगठन या समाज भी हो सकता है, और यही सामाजिक हित ही दलित है।
बाबा साहेब ने संविधान में इस वर्ग को बहुत खूबसूरत शब्द दिया था अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा, सामान्य लेकिन भारत के लोगों का जातीय लोभ इन वर्गों को जाति समझ व समझाकर स्थापित कर दिया। वैसे देखा जाय तो 6 हजार जातियों में बंटा यह समाज आज एक वर्ग भी अपनी जातियों को भुला नही पाया। सवर्णों से उम्मीद रखने वाला यही अनुसूचित समाज खुद में ही रोटी बेटी का रिश्ता तो दूर अभी मानवीय भाईचारा भी बनाने में कामयाब नही हुआ है। आज जब हम अनुसूचित जाति शब्द इस्तेमाल करते हैं तो जनजाति व पिछड़े अलग हों जाते हैं जबकि दलित शब्द के प्रयोग पर कुछ ही सही लेकिन एकत्रित होने का साहस कर रहे हैं।

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खुद को भूल न जाऊं भटक न जाऊं कहीं,
        एक टुकड़ा आइना जेब में रखता हूं अक्सर…।

जो लोग बचने या कटने की कोशिश कर रहे हैं उन्हें अपनी जाति या समाज की याद तभी आती है जब उनको किसी भी तरह अपमानित किया जाता है। तब उन्हें एहसास होता है कि बिना किसी कसूर और गुनाह के भी मैं अपने स्वतंत्र वजूद और अपनी पहचान को क्यों छुपा रहा हूं ? गलत मैं नही वह समाज है जिसने ऐसी सोच दी, गलत वह धर्म है जिसने ऐसी सोच बनाई और गलत वह लोग है जिन्होंने इस सोच को संरक्षित करने का काम किया। मुझे उनकी उसी गलती को उजागर करना ही होगा। मैं एक स्वतंत्र और स्पष्ट मनुष्य है मुझे कुछ छुपाने की आवश्यकता नही होनी चाहिए।
हालांकि बाबा साहेब ने भी दलित शब्द को स्वीकार नही किया था क्योंकि उनको यकीन था कि मैं बेहतर शब्द अपने समाज को दूंगा लेकिन आज उन्ही के उसी अनुसूचित शब्द को सीमित करने का प्रयास किया गया है। मान्यवर कांशीराम ने ‘बहुजन’ शब्द दिया तो यह केवल राजनीतिक परिप्रेक्ष्य या पहचान का अभिप्राय बना। फिर मूलनिवासी और अम्बेडकरवादी शब्द भी आये लेकिन आज जो ताकत दलित शब्द की बनती दिख रही है उसके सामने सारे शब्द और पहचान कमजोर हो रहे हैं।

मेरे वजूद में, सांसों की आगाही के लिए,
      तुम्हारा मुझमें धड़कना बहुत ज़रूरी है…!

  इसलिए  बाबा साहेब कि उस पंक्ति को याद रखें जहां उन्होंने कहा था कि यदि तुम लोग इस जहरीली जाति व्यवस्था को समाप्त करने में कामयाब न हुए तो अपनी जातीय पहचान को इतना मजबूत कर देना और इतना गर्व करना कि उसी जहरीले समाज के लिए ये एक सबब बने। आज यही हो रहा है, जाति और जाति के संस्कारों पर कहीं कोई दोशब्द सुनने को नही  मिलते हैं, और हम अपनी पहचान छुपाकर उनकी व्यवस्था का अप्रत्यक्ष समर्थन कर रहे हैं। जो लोग बड़ी बड़ी बातें धर्म और देश के प्रति करते हैं वो केवल खोखला भातृत्व है। आप लोग आज किसी एक विचार पर एक हो जाओ और उस पर गर्व करना सीखो।  दलित शब्द इसलिए भी मजबूती देगा क्योंकि इस शब्द की कोई राजनीतिक  या व्यक्तिगत पहचान नही है। ब्रह्मा के शुद्र, मनु के अछूत, गांधी के हरिजन, और बसपा के बहुजन से कही अधिक पवित्र और सक्षम है ये दलित। जबतक कुछ अच्छा नही हो जाता तब तक गर्व से स्वीकार करो और अपनी ताकत बनाओ।
शिक्षित बनो!  
      संगठित रहो!! 
                   संघर्ष करो !!!
इसलिए…

दरख़्त ए नीम हूं मेरे नाम से घबराहट तो होगी,
    छांव ठंडी ही दूंगा बेशक पत्तों में कड़वाहट तो होगी…!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व विश्लेषक है)

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