आओ हम सब मिलकर वसंत ऋतु का स्वागत करें

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दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगाँवलिया) । भारत ही विश्व में एक ऐसा देश है जहाँ छः ऋतुएँ होती हैं। ग्रीष्म ऋतु, वर्षा ऋतु, शिशिर ऋतु, हेमन्त ऋतु, शरद ऋतु और इन सब ऋतुओं की सरताज वसन्त ऋतु जन जीवन में आनंद घोलती है। वसंत भारत तथा समीपवर्ती देशों में अंग्रेज़ी कलेंडर के अनुसार फरवरी मार्च और अप्रैल के मध्य इस क्षेत्र में अपना सौंदर्य बिखेरती है। फाल्गुन और चैत्र मास वसंत ऋतु के माने गए हैं। फाल्गुन वर्ष का अंतिम मास है और चैत्र पहला। इस प्रकार विक्रम सम्वत के वर्ष का अंत और प्रारंभ वसंत में ही होता है।

शिशिर ऋतु में पेड़ पौधों के पुराने पत्ते झड़ जाते हैं। बसन्त आते ही प्रकृति में नया जीवन आ जाता है। आम के पेड़ों पर आए बौर, अंगारों की तरह दिखते पलाश के फूल, इसके अलावा अनेक प्रकार के फूल, रंग बिरंगे फूल जैसे चम्पा, चमेली, गुलाब, गैंदा प्रकृति की शोभा बढ़ा देते हैं। सरसों के खेत पीले पीले फूलों से खिल उठते हैं। हरियाली से ढंकी धरती और गुलाबी ठंड के इस ऋतु का मानव जीवन के लिए बहुत महत्व है।

वसंत के समय पंचतत्त्व अपना प्रकोप छोड़कर सुहावने रूप में प्रकट होते हैं। पंच-तत्त्व- जल, वायु, धरती, आकाश और अग्नि सभी अपना मोहक रूप दिखाते हैं। आकाश स्वच्छ रहता है, वायु सुहावनी लगती है, गुनगुनी धूप, स्नेहिल हवा, मौसम का नशा प्रेम की अगन को और भड़काता है। तापमान न अधिक ठंडा, न अधिक गर्म। सुहाना समय चारों ओर सुंदर दृश्य, सुगंधित पुष्प, मंद-मंद मलय पवन, फलों के वृक्षों पर बौर की सुगंध, जल से भरे सरोवर, बागों में आम के वृक्षों पर कोयल की कूक ये सब प्रीत में उत्साह भर देते हैं। यह ऋतु कामदेव की ऋतु है। यौवन इसमें अंगड़ाई लेता है। दरअसल वसंत ऋतु एक भाव है जो प्रेम में समाहित हो जाता है। अतः राग रंग और उत्सव मनाने के लिए यह ऋतु सर्वश्रेष्ठ मानी गई है और इसे ऋतुराज कहा गया है। नवगात, नवपल्ल्व, नवकुसुम के साथ नवगंध का उपहार देकर विलक्षणा बना देता है।

वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है, अग्नि (सूर्य) रुचिकर होती है तो जल पीयूष के समान सुखदाता और धरती उसका तो कहना ही क्या वह तो मानों साकार सौंदर्य का दर्शन कराने वाली प्रतीत होती है। ठंड से ठिठुरे विहंग अब उड़ने का बहाना ढूंढते हैं तो किसान लहलहाती जौ की बालियों और सरसों के फूलों को देखकर नहीं अघाता। धनी जहाँ प्रकृति के नव-सौंदर्य को देखने की लालसा प्रकट करने लगते हैं तो निर्धन शिशिर की प्रताड़ना से मुक्त होने के सुख की अनुभूति करने लगते हैं। सच! प्रकृति तो मानों उन्मादी हो जाती है। हो भी क्यों ना! पुनर्जन्म जो हो जाता है। श्रावण की पनपी हरियाली शरद के बाद हेमन्त और शिशिर में वृद्धा के समान हो जाती है, तब वसंत उसका सौन्दर्य लौटा देता है।

आया वसंत आया वसंत

छाई जग में शोभा अनंत।

सरसों खेतों में उठी फूल

बौरें आमों में उठीं झूल

बेलों में फूले नये फूल

पल में पतझड़ का हुआ अंत

आया वसंत आया वसंत।

लेकर सुगंध बह रहा पवन

हरियाली छाई है बन बन,

सुंदर लगता है घर आँगन

है आज मधुर सब दिग दिगंत

आया वसंत आया वसंत।

भौरे गाते हैं नया गान,

कोकिला छेड़ती कुहू तान

हैं सब जीवों के सुखी प्राण,

इस सुख का हो अब नही अंत

घर-घर में छाये नित वसंत।

समाजहित एक्सप्रेस की ओर से आप व आपके परिवार को बसंत पंचमी की हार्दिक बधाई एवं ढेर सारी शुभकामनाएं l

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