सरकार के प्रयासों से समाज में महिलाओं की स्थिति में बदलाव हुए है लेकिन पूर्ण सुरक्षित नहीं

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दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगाँवलिया) । स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व तक स्त्रियों की निम्न दशा के प्रमुख कारण अशिक्षा, आर्थिक निर्भरता, धार्मिक निषेध, जाति बन्धन, स्त्री नेतृत्व का अभाव तथा पुरूषों का उनके प्रति अनुचित दृष्टिकोण आदि थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से सरकार द्वारा उनकी आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक और राजनीतिक स्थिति में सुधार लाने तथा उन्हे विकास की मुख्य धारा में समाहित करने हेतु अनेक कल्याणकारी योजनाओं और विकासात्मक कार्यक्रमों का संचालन किया गया । जिससे नारी के साथ पुरूष की मानसिकता में बदलाव आया है।

मानव सभ्यता के हरेक युग में महिलाओं ने समाज को एक नई दिशा प्रदान की है। प्रेम, वात्सल्य व समर्पण से परिपूर्ण स्त्रियाँ, समाज को अपनी ऊर्जा से नया स्वरूप देने की क्षमता रखती हैं। स्वस्थ, शिक्षित व बदलते वक्त के साथ सामंजस्य स्थापित कर आज वे पुरुषों के परंपरागत वर्चस्व को चुनौती दे रही हैं। आज हर क्षेत्र में महिलाएं सफलता और उपलब्धियों के साथ नये कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं।

अगर, देश की चंद महिलाओं की सफलता व उन्नति देखकर हम यह मान रहे हैं कि देश में महिलाओं की स्थिति बहुत बेहतर है, तब यह हमारी बड़ी भूल समझी जाएगी। शिक्षा, जागरूकता व अपने अधिकारों से वंचित महिलाओं की एक बड़ी आबादी आज भी शारीरिक व मानसिक रूप से शोषित हो रही है। हद तो यह है कि कभी बहलाकर, झांसा देकर, तो कभी जबरदस्ती उनका शारीरिक शोषण किया जाता रहा है। कभी ‘बेटी’ होने के कारण उन्हें मां के उदर में ही मार दिया जाता है, तो कभी दहेज के नाम पर बहुएं जला दी जाती हैं और तो और परिवार न टूट जाए, इस वजह से ताउम्र अपमान व अन्याय का कड़वा घूंट पीकर महिलाएं चुप रह जाती हैं। अगर इन सब से वे बच भी जाएं, तो प्रतिदिन पुरुषों की भूखी नजरों से ‘बलात्कार’ का शिकार होना पड़ता है। महिलाओं के साथ आए दिन छेड़छाड़, भद्दे कमेंट्स करना और अपहरण की घटनाएं आम हो चुकी हैं। अब नारी समाज में पूजनीय नहीं, अपितु भोग की वस्तु समझी जा रही है। महानगरो में रोजाना जैसे-जैसे शाम परवान चढ़ती है, वैसे-वैसे पेट की जलती आग से जिस्म की मंडी (देह व्‍यापार) गुलजार होने लगती है। सब्‍जी की तरह मोलभाव शुरू हो जाता है। मामला पटते ही झमेला खत्‍म होता है और गाड़ी सीधे ठिकाने की तरफ रवाना हो जाती है। महिलाओं के लिए हर गली, हर मुहल्ला आज असुरक्षित हो गया है। महिलाओं की स्थिति पर गीतकार साहिर लुधियानवी उचित ही लिखते हैं कि :-

औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया

जब जी चाहा कुचला मसला, जब जी चाहा दुत्कार दिया

तुलती है कहीं दीनारों में, बिकती है कहीं बाज़ारों में

नंगी नचवाई जाती है, ऐय्याशों के दरबारों में

ये वो बेइज़्ज़त चीज़ है जो, बंट जाती है इज़्ज़तदारों में

मर्दों के लिये हर ज़ुल्म रवाँ, औरत के लिये रोना भी खता

मर्दों के लिये लाखों सेजें, औरत के लिये बस एक चिता

मर्दों के लिये हर ऐश का हक़, औरत के लिये जीना भी सज़ा

जिन होठों ने इनको प्यार किया, उन होठों का व्यापार किया

जिस कोख में इनका जिस्म ढला, उस कोख का कारोबार किया

जिस तन से उगे कोपल बन कर, उस तन को ज़लील-ओ-खार किया

मर्दों ने बनायी जो रस्में, उनको हक़ का फ़रमान कहा

औरत के ज़िन्दा जल जाने को, कुर्बानी और बलिदान कहा

क़िस्मत के बदले रोटी दी, उसको भी एहसान कहा

संसार की हर एक बेशर्मी, गुर्बत की गोद में पलती है

चकलों में ही आ के रुकती है, फ़ाकों में जो राह निकलती है

मर्दों की हवस है जो अक्सर, औरत के पाप में ढलती है

औरत संसार की क़िस्मत है, फ़िर भी तक़दीर की होती है

अवतार पयम्बर जनती है, फिर भी शैतान की बेटी है

ये वो बदक़िस्मत माँ है जो, बेटों की सेज़ पे लेटी है

वास्तव में आज समाज के सामने महिलाओ की सुरक्षा का यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया है। आज हमारे देश में ‘महिला सुरक्षा’ किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। हालांकि, आधी आबादी की सुरक्षा की जिम्मेदारी, ना सिर्फ प्रशासन की है, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की है। दुखद यह है कि महिलाओं को सम्मान देने के मामले में इन दोनों मोर्चों पर हम नाकाम रहे हैं। एक तरफ, समय के साथ लोगों में नैतिक पतन होता दिखा है, तो दूसरी तरफ प्रशासन की आंखों में ‘मोतियाबिंद’ का रोग भी गहराता गया है।

गांवों में आज भी जादू-टोना और डायन बिसाही के शक में महिलाओं की हत्या की जाती है अथवा उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। आलम यह है कि प्यार की मूरत व सागर समझी जाने वाली महिलाओं पर काला जादू या टोना-टोटका के अंधविश्वास भरे आरोप लगा कर पहले उसे डायन घोषित किया जाता है, फिर प्रताड़ित और अंत में जान से मार दिया जाता है। महिलाओं को न सिर्फ घरों में, अपितु समाज के हरेक क्षेत्रों में उन्हें उपेक्षा का शिकार होना पड़ा है।

वर्तमान समय में सरकार द्वारा महिलाओं के उत्थान के लिए अनेक कार्यक्रम एवं योजनाओं का संचालन तो कर रहीं हैं लेकिन इन योजनाओं का क्रियान्वयन निचले स्तर तक उचित ढंग से न पहुँच सकने के कारण स्त्रियों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है। यह सत्य है कि वर्तमान समय में स्त्रियों की स्थिति में काफी बदलाव आए हैं, लेकिन फिर भी वह अनेक स्थानों पर पुरुष-प्रधान मानसिकता से पीड़ित हो रही है।

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