जो आज बच्चा है, उसे कल जवान फिर बूढ़ा होना है। वक्त बार-बार अपने को दोहराता है ।

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दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस l

शादी की सुहागसेज पर बैठी दुल्हन का पति जब भोजन का थाल लेकर अंदर आया तो पूरा कमरा उस स्वादिष्ट भोजन की खुशबू से भर गया रोमांचित उस दुल्हन ने अपने पति से निवेदन किया कि मांजी को भी यहीं बुला लेते तो हम तीनों साथ बैठकर भोजन करते। पति ने कहा छोड़ो उन्हें, वो खाकर सो गई होंगी, आओ हम साथ में भोजन करते है प्यार से, उस दुल्हन ने पुनः अपने पति से कहा कि नहीं मैंने उन्हें खाते हुए नहीं देखा है, तो पति ने जवाब दिया कि क्यों तुम जिद कर रही हो शादी के कार्यों से थक गयी होंगी इसलिए सो गई होंगी, नींद टूटेगी तो खुद भोजन कर लेंगी। तुम आओ हम प्यार से खाना खाते हैं।

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उस दुल्हन ने तुरंत डिवोर्स (divorce) लेने का फैसला कर लिया और डिवोर्स (divorce) लेकर उसने दूसरी शादी कर ली और इधर उसके पहले पति ने भी दूसरी शादी कर ली। दोनों अलग- अलग सुखी घर गृहस्ती बसा कर खुशी खुशी रहने लगे।

इधर उस स्त्री के दो बच्चे हुए जो बहुत ही सुशील और आज्ञाकारी थे। जब वह स्त्री 60 वर्ष की हुई तो वह बेटों को बोली में चारो धाम की यात्रा करना चाहती हूँ ताकि तुम्हारे सुखमय जीवन के लिए प्रार्थना कर सकूँ। बेटे तुरंत अपनी माँ को लेकर चारों धाम की यात्रा पर निकल गये।

एक जगह तीनों माँ बेटे भोजन के लिए रुके और बेटे भोजन परोस कर मां से खाने की विनती करने लगे। उसी समय उस स्त्री की नजर सामने एक फटेहाल, भूखे और गंदे से एक वृद्ध पुरुष पर पड़ी जो इस स्त्री के भोजन और बेटों की तरफ बहुत ही कातर नजर से देख रहा था। उस स्त्री को उस पर दया आ गईं और बेटों को बोली जाओ पहले उस वृद्ध को नहलाओ और उसे वस्त्र दो फिर हम सब मिलकर भोजन करेंगे।

बेटे जब उस वृद्ध को नहलाकर कपड़े पहनाकर उसे उस स्त्री के सामने लाये तो वह स्त्री आश्चर्यचकित रह गयी वह वृद्ध वही था जिससे उसने शादी की सुहागरात को ही डिवोर्स (divorce) ले लिया था। उसने उससे पूछा कि क्या हो गया जो तुम्हारी हालत इतनी दयनीय हो गई तो उस वृद्ध ने नजर झुका के कहा कि सब कुछ होते ही मेरे बच्चे मुझे भोजन नहीं देते थे, मेरा तिरस्कार करते थे, मुझे घर से बाहर निकाल दिया।

उस स्त्री ने उस वृद्ध से कहा कि इस बात का अंदाजा तो मुझे तुम्हारे साथ सुहागरात को ही लग गया था जब तुमने पहले अपनी बूढ़ी माँ को भोजन कराने के बजाय उस स्वादिष्ट भोजन की थाल लेकर मेरे कमरे में आ गए और मेरे बार-बार कहने के बावजूद भी आप ने अपनी माँ का तिरस्कार किया। उसी का फल आज आप भोग रहे हैं।

जैसा व्यहवार हम अपने बुजुर्गों के साथ करेंगे उसी देखा-देख कर हमारे बच्चों में भी यह गुण आता है कि शायद यही परंपरा होती है। यह तो सर्वविदित है कि जो आज बच्चा है, उसे कल जवान फिर बूढ़ा होना है। वक्त बार-बार अपने को दोहराता है, किसी के लिए रुकता नहीं है। इसलिए इस बात पर गौर करके इसे महत्वपूर्ण जानकर आपस में विचार-विमर्श करना जरूरी है कि जो कुछ भी हम कर रहे हैं या हो रहा है वह सही नहीं है। आज जैसे संस्कार, गुण हम अपने बच्चों को देंगे, जैसा व्यवहार उनके सामने बड़ों से करेंगे, वैसा ही कल वे हमारे साथ करेंगे। क्योंकि यह कहावत तो सबने सुनी ही है, ‘जैसा बोएँगे, वैसा ही काटेंगे।’ अतः अभी भी समय रहते यदि हमने अपनी आदतों में सुधार नहीं किया, अपने में बदलाव नहीं लाए तो फिर जिस तरह की अपेक्षाएँ, तमन्नाएँ हमारी अपने बच्चों से हैं, वे कभी भी पूरी नहीं हो सकेंगी तथा सिवाय पछतावे के और कुछ भी हासिल नहीं होगा।

वृद्धावस्था आते ही जरूर उनके मन में यह आस व इच्छा प्रबल हो जाती है कि अपनों से थोड़ा लगाव, अपनापन व मान-सम्मान मिल जाए। ताकि जीवन के जो भी गिने-चुने शेष दिन बचे हैं उनमें किसी तरह का उतार-चढ़ाव न देखकर सिर्फ और सिर्फ प्यार की ही छाँव देखने को मिले और जब भी ऊपर वाले का बुलावा आए तो खुशी-खुशी चैन से आँखें मूँद सकें। खैर! सुबह का भूला यदि शाम को घर लौट आए तो भी देर नहीं होती, अच्छे कर्मों की एक नई शुरुआत हम अभी से कर सकते हैं।

कहने का सार यही है कि यदि हम बुजुर्गों की इज्जत करेंगे तो हमारा जीवन सुखमय हो जाएगा, क्योंकि सेवा-सुश्रुषा करने से कोई भी दुःख या विपदाएँ उनकी दुआओं से नहीं आएँगी और घर में भी सुख-समृद्धि, संपन्नता खुद ब खुद ही आ जाएगी। इस सत्य को सदैव ध्यान में रखना चाहिए कि हमारे सिर पर यदि बड़ों का ममतामयी हाथ है तो फिर दुनिया में हमसे ज्यादा भाग्यशाली, ज्यादा सुखी और कोई नहीं हो सकता है।

सदैव माँ बाप की सेवा ही हमारा दायित्व बनता है।

जिस घर में माँ बाप हँसते है, वहीं पे प्रभु बसते है।

2019 के लोकसभा चुनाव में आप किसके साथ हैं........??

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