समाज में प्रचलित ओढावणी जैसी प्रथा को बन्द करने का सुरेश कुमार कनवाङिया ने लिया संकल्प

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दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगाँवलिया) । रैगर समाज में अनेक सामाजिक कुरीतियां प्रचलित हैं । जिनमे से ओढावणी जैसी एक प्रथा भी सामाजिक कुरीतियों की श्रेणी में है जिसे श्रीगंगानगर के समाजसेवी सुरेश कुमार कनवाङिया ने अपने घर परिवार से बंद करने का संकल्प लिया और समाजहित एक्सप्रेस को अपने संकल्पित विचारो से अवगत कराया l यह समाजहित में एक सराहनीय पहल है l समाज के लोगो को भी इस पहल का अनुशरण करना चाहिए ताकि समाज से ओढावणी/पछेवङी की सामाजिक कुरीति बंद हो सके l

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सुरेश कुमार कनवाङिया के ओढावणी/पछेवङी बंद करने के संदर्भ में संकल्पित विचार :-

छोटी सी बात जो मेरे मन को बरसों कचोटती रही । मगर मैं अभी तक अपनों को ओढावणी के विरुद्ध सहमत नहीं करा पाया । आज मैं इस प्रथा का विरोध ही नहीं करता बल्कि समयानुसार अनुचित और अनावश्यक भी करार देता हूँ और अपने आपको इस प्रथा से अलग करता हूँ । फिर भी मैं किसी पर यह प्रथा त्यागने का दबाव नहीं डाल रहा ।

मैं यह संकल्प करता हूँ कि आज से अपने परिवार / समाज के रीति-रिवाजों में ओढावणी/पछेवङी के तौर पर मेरे रिश्तेदारों के किसी भी पक्ष द्वारा मुझे दी जाने वाली वस्तु ,वस्त्र ,नगदी की भेंट स्वीकार नहीं करूंगा । केवल मेरे ससुराल पक्ष के रिश्तेदारों से किसी भी अवसर पर शामिल होने पर विदाई के समय तिलक के साथ एक सीमित राशि प्रतीक रूप में स्वीकार करूंगा । मेरे नाम पर मेरी अनुपस्थिति में दी जाने वाली वस्तु , वस्त्र ,नगदी किसी अन्य को नहीं दी जायेगी और न मेरे स्थान पर कोई ग्रहण करेगा । सब अपने-अपने स्थान की भेंट ही स्वीकार करेंगे ।

इसमें किसी का मान या अपमान करने का मेरा कोई उद्देश्य नहीं है । मेरी अपने विचारों और भावनाओं को जो मैं परिवार, समाज और बुजुर्गों के सम्मान के तौर पर लागू करने से बचता रहा ,परिवार में सेवानिवृत्त वरिष्ठ सदस्य के तौर पर सिर्फ अपने लिए लागू करना चाहता हूँ । मेरे बङों और छोटों को अपने रिवाज निभाने से नहीं रोकता । इसके साथ ही वर्तमान में मौजूद अपने बङे-बुजुर्गों से क्षमा भी चाहूँगा और उन्हें मेरा निर्णय ठीक लगे तो उनका आशीर्वाद भी चाहूँगा ।

मेरी बहन-बेटियों के परिवार में भी शुभ अवसरों पर शामिल होने पर उनके पति ,बच्चों व जीवित सास ससुर को जरूरत के अनुसार उपहार का उद्देश्य रहेगा । उनके परिवार के अन्य लोगों को लेन-देन की यदि कोई परम्परा होती है तो इसकी जिम्मेदारी लङकी पक्ष वालों अर्थात् मेरी न होकर उन्हीं लोगों की होगी । अपने भाई बन्धुओं को वे लोग कुछ भी दें या न दें , उनकी अपनी मर्जी रहेगी । मेरे घर में किसी शुभ अवसर पर मेरे ससुराल व बहुओं के पीहर पक्ष के लिए भी मेरे रहते यही बात लागू रहेगी ।

इसके अलावा मुझे देने वाला कोई रिश्तेदार अपने मान- अपमान का सवाल उठाए तो मेरा निवेदन रहेगा कि जब अपने लिए या किसी उद्देश्य के लिए मुझे जरूरत होगी तब आपसे मांग कर ले लूंगा । आप अपनी इच्छा और क्षमता के अनुसार दे देना । तब भी आप पर कोई दबाव नहीं होगा । मगर मेरे परिवारजनों में से व किसी समाज बन्धु को मेरे विचार पसंद आते हैं और स्वेच्छा से स्वयं पर लागू करता है तो मुझे खुशी होगी ।

सुरेश कुमार कनवाङिया , श्रीगंगानगर ।

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