रैगर समाज का वीरता, त्याग, बलिदान तथा शौर्य की दृष्टि से गौरवशाली इतिहास रहा है ।

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दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगाँवलिया) । रैगर जाति का इतिहास सदैव गौरवशाली रहा है । रैगर जाति में एक नहीं अनेकों वीर (झूंझार) पैदा हुए हैं । वीर (झूंझार) उसे कहते हैं जो युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त होता है । वीर (झूंझार) योद्धा होता है जो युद्ध में हार कर लौटने की बजाय बहादुरी के साथ लड़ते हुए युद्ध स्थल में ही मरना श्रेष्ठ समझता है । रैगर जाति के वीरों (झूंझारों) का इतिहास देखने से यह प्रमाणित होता है कि रैगर एक बहादुर कौम है । वे क्षत्रियों की तरह ही हथियार उठा कर युद्ध में कूदे हैं और वीरता का परिचय देते हुए युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए हैं । यह दुर्भाग्य की बात है कि दूषित वर्ण व्‍यवस्‍था के चलते इतिहास और साहित्‍य रचना का दायित्‍व जिन इतिहासकारों का था, उन्होने संकीर्णताभरी मानसिकता और पक्षपात रवैये के कारण रैगर वीरों (झूंझारों) को इतिहास में कहीं स्थान नहीं दिया ।

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किसी देश या जाति को मिटाना है तो उसका इतिहास मिटा दें वह देश या जाति स्वत: मिट जायेगी । इतिहास के अभाव में वह जाति या देश अपना मूल स्वरूप ही खो बैठेगी, वह भटक जायेगी । रैगर जाति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है l आज के युग में कई जातियाँ अपना इतिहास खोजने का प्रयास कर रही है । सही रूप में देखा जाय तो जो जातियाँ आज पिछड़ी हुई मानी जाती है वे उन्‍हीं शासक वर्ग के वंशजों में से हैं जो शासन सत्‍ता के विध्‍वंश हो जाने से अपने प्राणों को बचाने के लिए इन जातियों में मिल गए और जो नहीं मिले उन्‍हें गुलाम बनाकर प्रताड़ित किये गए और वे अपने इतिहास और अस्तित्‍व को ही भूल गए ।

समाजहित एक्सप्रेस आज आपको चन्दनमल नवल कृत ‘रैगर जाति: इतिहास एवं संस्कृति’ की किताब में दर्ज इतिहास से रैगर जाति के वीरों (झूंझारों) के बारें में परिचय करवाते है l रैगर जाति में हुए कुछ वीरों (झूंझारों) का वर्णन निम्नानुसार हैं :-

  1. सम्वत् 603 में राजू मोलपुरिया निवासी मालपुरा ने टौंक के बादशाह तथा जैसलमेर के भाटियों के बीच हुए युद्ध में बड़ी वीरता के साथ लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और शूरमा कहलाया ।
  2. सम्वत् 1732 में बीजमेर मोणिया (निवासी-पीपलाद) मराठों के युद्ध में लड़ते हुए शहीद हुए ।
  3. सम्वत् 1153 में गुंजल सवांसिया (निवासी-दिल्ली) पृथ्वीराज और मुगलों के बीच हुए युद्ध में बड़ी बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए । दिल्ली में पुराने किले के पास वीर गुंजल की समाधि बनी हुई थी ।
  4. सम्वत् 1172 में मानसहाय खटनावलिया युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए ।
  5. सम्वत् 1232 में शेखावतों के युद्ध में ईशर खटनावलिया लड़ते हुए रण स्थल पर वीरगति को प्राप्त हुए ।
  6. सम्वत् 1303 में कालूजी बंसीवाल (निवासी- बस्सी) ने मुगलों के आक्रमणों में बड़ी बहादुरी के साथ लड़ते हुए अपने प्राण गंवाए ।
  7. अमरसिंह राठौड़ के समय में वेणा कुरड़िया (निवासी- नागौर) युद्ध में शत्रुओं से लड़ते हुए शहीद हुए ।
  8. सम्वत् 1433 में खुमानराणा हालाहाड़ा के बीच जंग हई जिसमें हमीरा बहादुरी के साथ लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ ।
  9. सम्वत् 1561 में खेताजी कुरड़िया (निवासी-पीपाड़) दरबार सुमेरसिंहजी के समय में हुए युद्ध में शत्रुओं से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए ।
  10. सम्वत् 1613 में हेमा बंसीवाल (निवासी- बस्सी) सरवाड़ के मीरखां की लड़ाई में वीरगति को पाप्त हुए । चित्तौड़ निवासी शिवशंकर मण्डावरिया राजपूतों और मुगलों की लड़ाई में वीरता का प्रदर्शन करते हुए युद्ध में प्राण त्यागे ।
  11. गौरधन झाड़ोटिया गोगदव चौहान और मुगलों के बीच हुए युद्ध में लड़ते हुए शहीद हुए ।
  12. सम्वत् 1632 में माणक बडारिया (निवासी- खेड़ा) किशनगढ़ के राठौड़ों और डोडी राजूतों के बीच हुए संघर्ष में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए ।
  13. सम्वत् 1672 में धनजी जेलिया केलावा के युद्ध में लड़ते हुए शहीद हुए ।

रैगर हथियार उठा कर युद्ध में कूदे हैं और वीरता का परिचय देते हुए युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए हैं । वीरता की दृष्टि से रैगर युद्ध में दुश्मनों के छक्के छुड़ाने में किसी से पीछे नहीं रहे हैं । वीरता, त्याग, बलिदान तथा शौर्य की दृष्टि से रैगरों का इतिहास शानदार रहा है । रैगर हमेशा ही बहादुर कौम रही है । अतः रैगर अपने को अन्य किसी से भी हीन नहीं समझे ।

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