बड़े-बुजुर्गों और ऊँची जाति के लोगों के सामने महिलाओ के चप्पल हाथ में लेने की कुप्रथा का बहिष्कार

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दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगाँवलिया) । भारत मंगलयान का जश्न मना रहा है, महिलाओं को बराबरी का हक नहीं बल्कि उन्हें आगे लाने और पूरा सम्मान देने के लिए तमाम पहल, कई कानून बने हैं लेकिन आज भी कई ग्रामीण इलाकों में हालात अभी पूरी तरह नहीं बदले । सामाजिक भेदभाव, गैर-दलितों द्वारा दलितों का अन्धाधुन्ध शोषण, शिक्षण संस्थाओं और छात्रावासों में सवर्णों द्वारा जातिगत उत्पीड़न आज भी खुले-आम जारी है l चाहे आप कितने बड़े से बड़े और ऊंचे ओहदे पर पहुंच जाये ऊँच-नीच की मानसिकता पीछा नहीं छोड़ती l

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भारत में संविधान लागू होने के 70 साल बाद भी कई प्रान्तों के दूर-दराज क्षेत्रों से हैरान करने वाली जातीय भेदभाव की खबरें आती हैं, जो विकास और समानता की बातें झुठला देती हैं l इक्कीसवीं सदी में बुंदेलखंड के ललितपुर में दलित महिलाओं के लिए एक बड़ी शर्मनाक प्रथा का प्रचलन है जिसमे कि दलित समाज की महिलाओं को अपने ही घर के पुरुषों या ऊंची जाति के लोगों के सामने चप्पल पहनकर जाना इज्जत और मर्यादा का विषय माना जाता है l सिर्फ महिला ही नहीं बल्कि पुरुष भी ऊंची जाति के सामने चप्पल पहनकर नहीं जाते हैं l जबकि हम और आप घर की चमचमाती फर्श तक पर नंगे पैर नहीं चलते ।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक वर्षों से चली आ रही अव्यवहारिक इस परंपरा के कारण ‘चाहे जितनी सर्दी हो, तपती धूप हो, दलित जाति के महिला और पुरुषो को बड़ी जाति के लोगों के सामने चप्पल पहनने की इजाजत नहीं थी l लेकिन आज भी प्रधान के पास गाँव के बुजुर्ग लोग चप्पल पहनकर नहीं जाते l अगर जाते भी हैं तो हाथ में चप्पल लेकर जाते हैं l

मड़ावरा ब्लॉक की कल्पना बताती हैं, “लंबा घूंघट, किसी से बात न करना, छोटी जाति के हैं तो मंदिर नहीं जाना, नल पर तब तक पानी नहीं भर सकते जब तक ऊंची जाति के लोग भरकर न चले जाएं। प्रधान के सामने बैठ नहीं सकते, बैठना है तो जमीन पर बैठें। इन सबका हमने विरोध किया।” “इस प्रथा को खत्म करने में मुझे एक साल का समय लगा, सास को लगा हम पढ़ाने जाने लगे तो हमारा दिमाग खराब हो गया। सब मास्टरनी कहकर हमारा मजाक बनाते थे, हमने सोच लिया था कि कुछ भी हो जाए, हम चप्पल लेकर हाथ में नहीं जाएंगे।” ये कहना है ज्ञानबाई अहिरवार का।

इन पढ़ी-लिखी ग्रामीण महिलाओं ने अपनों से और समाज से खुलकर लड़कर चप्पल प्रथा जैसी पुरानी कुप्रथाओं का विरोधकर पितृसत्तात्मक सोच पर विजय पायी है। इनमें से कुछ महिलाओं ने कई दिन खाना नहीं खाया तो कुछ ने अपने पतियों की मार सही, कईयों को तो जुर्माना भी देना पड़ा तब कहीं जाकर आज ये महिलाएं स्वतंत्र होकर अपनी जिन्दगी जी पा रही हैं। सामाजिक कुप्रथाओं से जब कोई जूझता है तो उसके विचारों में भी उथल-पुथल मचने लगती है और तब वह कुछ क्रान्तिकारी परिवर्तन की तरफ अपने कदम बढ़ाता है l

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