बाबा ज्योतिबा फूले जी की पुण्यतिथि पर विशेष

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बाबा ज्योतिबा फूले जी को उनकी पुण्यतिथि पर हृदय की गहराईयों से कोटि कोटि नमन।
ज्योतिराव गोविंदराव फुले(महात्मा फुले/ज्योतिबा फुले) की पुण्यतिथि पर सादर श्रद्धांजलि 

दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगाँवलिया) ।

ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रॅल, 1827 ई. में पुणे में हुआ था। उनका परिवार कई पीढ़ी पहले सतारा से पुणे फूलों के गजरे आदि बनाने का काम करने लगा था। इसलिए माली के काम में लगे ये लोग ‘फुले’ के नाम से जाने जाते थे। ज्योतिबा ने कुछ समय पहले तक मराठी में अध्ययन किया। परंतु लोगों के यह कहने पर कि पढ़ने से तुम्हारा पुत्र किसी काम का नहीं रह जाएगा, पिता गोविंद राम ने उन्हें स्कूल से छुड़ा दिया। जब लोगों ने उन्हें समझाया तो तीव्र बुद्धि के बालक को फिर स्कूल जाने का अवसर मिला और 21 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंग्रेज़ी की सातवीं कक्षा की पढ़ाई पूरी की।

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1848 में कार्ल मार्क्स जहाँ क्रांति के दस्तावेज लिख रहे थे,वही भारत मे ज्योतिबा फुले ने पहली बार शुद्र महिलाओं के लिए स्कूल खोलकर एक नई तरह की क्रांति का आगाज किया।

21 वर्ष की आयु में ज्योतिबा फुले जी ने महाराष्ट्र को एक नये ढंग का नेतृत्व दिया | ज्योतिबा फुले जी ने महाराष्ट्र की नारी तथा शुद्रो दोनों को सामाजिक गुलामी से मुक्त कराने की प्रतिज्ञा की | सर्वप्रथम उन्होंने एक बालिका विद्यालय की नींव डाली और उस विद्यालय में सभी छोटी जातियों की छात्राएं शिक्षा पाने लगी |

ज्योतिबा जी का विचार था कि अगर नारी शिक्षित नहीं होगी तो उसके बच्चे संस्कारी और परिष्कृत नहीं बन सकते।

महात्मा फुले एक समतामूलक और न्याय पर आधारित समाज की बात कर रहे थे इसलिए उन्होंने अपनी रचनाओं में किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए विस्तृत योजना का उल्लेख किया है। पशुपालन, खेती, सिंचाई व्यवस्था सबके बारे में उन्होंने विस्तार से लिखा है।

गरीबों के बच्चों की शिक्षा पर उन्होंने बहुत ज़ोर दिया। उन्होंने आज के 150 साल पहले कृषि शिक्षा के लिए विद्यालयों की स्थापना की बात की। जानकार बताते हैं कि 1875 में पुणे और अहमदनगर जिलों का जो किसानों का आंदोलन था, वह महात्मा फुले की प्रेरणा से ही हुआ था। इस दौर के समाज सुधारकों में किसानों के बारे में विस्तार से सोच-विचार करने का रिवाज़ नहीं था लेकिन महात्मा फुले ने इस सबको अपने आंदोलन का हिस्सा बनाया।

जब फुले के पिताजी उन्हें विद्यालय में प्रवेश दिलाने गए तब जहाँ अन्य उच्च जाति वाले शिक्षकों ने उन्हें नही पढ़ाने की वकालत की वही एक मुस्लिम शिक्षक *’गफ्फार बेग मुंशी’* ने गोविन्दराव फुले (ज्योतिबा के पिता) को ज्योतिबा को पढाने हेतु प्रोत्साहित किया।

गफ्फार बेग मुंशी जी के ज्योतिबा को पढाने हेतु किये गए प्रोत्साहन हेतु समस्त वंचित वर्ग उनका सदैव कृतज्ञ रहेगा।

फुले लैंगिक समानता के समर्थक थे। समाज मे व्यापत सती प्रथा के विरोध में उन्होंने लिखा “यदि स्त्री पति के साथ सती होती है तो पति पत्नी की मृत्यु पर सता क्यो नही होता?”

फुले का मानना था कि जब तक स्त्री को ,पुरुष के समान अधिकार और महत्व नही दिया जाएगा तक समाज मे असमानता बनी रहेगी ।

फुले ब्राह्मणवादी विचारो के घोर विरोधी थे। फुले का कहना था “हमे राम राज्य नही चाहिए हमे तो *# राजा बाली #* का समता मूलक,समानता ओर बन्धुत्व पर आधारित *”बाली राज्य”* चाहिए ।”

गरीबो व निर्बल वर्ग को न्याय दिलाने के लिए ज्योतिबा ने ‘सत्य शोधक समाज’ स्थापित किया।उनकी समाज सेवा को देखकर 1888 ई. में मुम्बई की एक विशाल सभा ने उन्हें *महात्मा* की उपाधि प्रदान की।

महात्मा फुले का आज ही के दिन(28 नवम्बर 1890) को 63 वर्ष की आयु में देहावसान हो गया था।

ज्योतिबा फुले की पुण्य तिथि पर कोटिशः नमन । 💐💐💐💐💐

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