कवि से गीतकार बने दलित शैलेन्द्र जीनियस थे लेकिन जाति के कारण भुला दिया गया ….

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जिंदगी के हर रंग और फलसफे को गीतों में ढालने वाला फनकार

दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस ।

महान गीतकार शैलेंद्र को सुनते हुए शायद कभी ये बात ज़ेहन में नहीं आई होगी कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में कालजयी गीतों की रचना करने वाले शैलेन्द्र को कभी कोई बड़ा पुरस्कार नहीं मिला । उनका जीवन जातीय भेदभाव की परछाईयों के साये में आगे बढ़ा और बेहद मुफ़लिसी के बीच खत्म हुआ । इसी का नतीजा था कि शैलेंद्र सिनेमाई जमीं के अज़ीम फनकार होते हुए भी जाति के चलते भुला दिए गये ।

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दरअसल शैलेन्द्र का असली नाम था शंकरदास केसरीलाल । वे मूलरूप से बिहार के आरा के धूसपुर गांव के धुसी चमार जाति के थे। उनका जन्म 30 अगस्त 1923 में पाकिस्तान के रावलपिंडी में हुआ था । उनके पिता की तबियत खराब होने पर उनका परिवार जब बहुत मुश्किलों में फंस गया तो वे लोग उत्तरप्रदेश के मथुरा में उनके चाचा के पास आ गये। मथुरा से ही बेहद गरीबी के बीच शैलेन्द्र ने मैरिट तक की पढ़ाई पूरी की। इलाज के पैसे ना होने की वजह से अपनी एकलौती बहन को उन्होंने आँखों के सामने ही खो दिया। बचपन में जब शैलेंद्र हॉकी खेला करते थे लेकिन साथ खेलने वाले लड़के उनकी जाति को लेकर बुरा व्यवहार करते थेl उन्हें अक्सर ये तंज सुनना पड़ता था कि “अब ये लोग भी खेलेंगे”l परेशान होकर उन्होंने खेलना ही छोड़ दिया।

पढ़ाई पूरी कर के वो बम्बई गए वहाँ 1950 के शुरुआती दिनों में रेलवे यार्ड में एक वेल्डर के तौर पर नौकरी भी की पर अधिकारियों के परेशान करने के कारण वह भी छोड़नी पड़ी। उन्हें कविता का शौक था ही, एक कविता पाठ समारोह में उनका राज कपूर से मिलना हुआ और यहीं से उनकी सिनेमा जगत में इंट्री भी हुई। शैलेन्द्र ने एक से बढ़कर एक खूबसूरत गीत लिखे।

उन्होने़ 800 से ज्यादा गीत लिखे और उनके लिखे ज्यादातर गीतों को बेहद लोकप्रियता हासिल हुई । इनमें ‘आवारा’ ‘दो बीघा जमींन’, ‘श्री 420’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’, ‘संगम’, ‘ आह’, ‘ सीमा’, ‘मधुमती’, ‘जागते रहो’, ‘गाइड’, ‘काला बाजार’, ‘बूट पालिस’, ‘यहूदी’, ‘अनाड़ी’,‘पतिता’, ‘दाग’, ‘मेरी सूरत तेरी आंखें’, ‘बंदिनी’, ‘गुमनाम’ और ‘तीसरी कसम’ जैसी महान फ़िल्मों के गीत शामिल हैं। उन्होंने अपने गीतों में वंचना का शिकार लोगों की पीड़ा को ज़ुबान दी। अपने गानों में उन्होंने समतामूलक समाज निर्माण और मानवतावादी विचारधारा को शब्दों में पिरोया है। उन्होंने दबे-कुचले लोगों को संघर्ष का नारा दिया था –

“हर जोर-जुल्म की टक्कर में, हड़ताल हमारा नारा है ।”

उन्होंने सिनेमा में काम करने के लिए अपना तखल्लुस या उपनाम को ही नाम के रूप में प्रयोग किया। ये वो दौर था जब दलितों और मुसलमानों को सिनेमा में सफल होने के लिए अपना नाम बदलकर अपनी पहचान छुपानी पड़ती थीl शैलेन्द्र के दलित होने की जानकारी उनकी मौत के बाद पहली बार सार्वजनिक तौर से तब सामने आयी जब वर्ष 2015 में उनके बेटे दिनेश शैलेंद्र ने अपने पिता की कविता संग्रह “अंदर की आग” की भूमिका में इसके बारे में लिखा। इस भूमिका को पढ़ने के बाद साहित्य जगत के मठाधीशों ने दिनेश को जातिवादी कहते हुए उनकी जमकर आलोचना की थी l

भारत में जब तथाकथित अपर कास्ट ब्राह्मण-क्षत्रिय होने की बात को छाती ठोक कर बताते हैं तो उनका ये जातिय दंभ सबको नॉर्मल लगता हैl लेकिन वहीं पर जब कोई दलित अपनी आइडेंटिटी को लेकर असर्ट करता है तो उसे जातिवादी होने का तमगा थमा दिया जाता है।

उन्होंने फणीश्वरनाथ रेणु की अमर कहानी ”मारे गए गुलफाम” पर आधारित ”तीसरी कसम” फिल्म बनायी। फिल्म की असफलता और आर्थिक तंगी ने उन्हें तोड़ दिया। वे गंभीर रूप से बीमार हो गये और आखिरकार 14 दिसंबर, 1967 को मात्र 46 वर्ष की आयु में उनकी मौत हो गयी। फिल्म की असफलता ने उन पर कर्ज का बोझ चढ़ा दिया था। इसके अलावा उन लोगों की बेरुखी से उन्हें गहरा धक्का लगाए जिन्हें वे अपना समझते थे। अपने अन्तिम दिनों में वे शराब के आदी हो गए थे

बाद में ‘तीसरी कसम’ को मास्को अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में भारत की आधिकारिक प्रविष्ठी होने का गौरव मिला और यह फिल्म पूरी दुनिया में सराही गयी। पर अफसोस शैलेन्द्र इस सफलता को देखने के लिए इस दुनिया में नहीं थे। उन्होंने वो मुक़ाम हासिल किया जो आज तक कोई गीतकार हासिल न कर सका ।

शैलेन्द्र को उनके गीतों के लिये तीन बार फिल्म फेयर अवार्ड से सम्मानित किया गया। लेकिन इस दलित विभूति की मीडिया, सवर्ण समाज और सरकार ने जीते जी और उनकी मृत्यु के बाद भी उपेक्षा की।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उनके अपने दलित समाज ने भी उन्हें भुला दिया है । वे हम बहुजनों के रोल मॉडल हैं। उन्हीं के शब्द हैं- “तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत में यक़ीन कर ।”

क्रांतिकारी जयभीम🙏

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