राजस्थान के गंगानगर जिले में बाबा रामदेव जी की 54 फिट विशाल मूर्ति का निर्माण हुआ

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दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगाँवलिया) । राजस्थान के निःकलंक अवतार बाबा रामदेव जी महाराज के जीवन व्रत और उनकी जीवन शिक्षा का प्रसार करने के लिये ही राजस्थान के गंगानगर जिले में NH 15 पर बाबा रामदेव जी के उपासक और प्रचारक श्री राम्दित्ता जी महाराज ने गुरु चेला सेवा आश्रम में बाबा रामदेव जी की 54 फिट विशाल मूर्ति का निर्माण करवाया है । जिसका उद्देश्य बाबा रामदेव जी के जीवन व्रत और समाज में उनके द्वारा पाखंड व छुआछुत को मिटा कर, आडम्बर और अन्धविश्वासो को दूरकर पगालियों का पूजन कराकर सामाजिक एकता की प्राचीन परम्परा को स्थापित करने के योगदान को जन जन तक पहुंचाया जा सके ।

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ग्यारहवी शताब्दी में दिल्ली के एक राजा थे श्री अनंगपाल जी, उनके दो पुत्रिया थी कमला बाई और रूप सुंदरी बाई l कमला बाई का विवाह अजमेर के राजा सोमेश्वर चोहान के साथ हुआ तथा रूप सुंदरी बाई का विवाह कनोज के राजा विजयपाल जी राठोर के साथ हुआ l महाराज अनंगपाल जी को कोई लड़का नहीं था l उन्होंने कमला बाई के पुत्र पृथ्वीराज चोहान को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया l धीर सिंह जी तंवर महाराज अनंगपाल जी के चचेरे भाई थे l उन्होंने कुछ राज्य धीर सिंह जी तंवर को भी दिया l

धीर सिंह जी तंवर को एक पुत्र था जिनका नाम रनसिंह जी तंवर था l रनसिंह जी तंवर को दो पुत्र थे एक का नाम धनरूप जी तंवर तथा दुसरे का नाम अजमल जी तंवर था l धनरूप जी तंवर को दो पुत्रिया थी लच्छा बाई एवं सुगना बाई l अजमल जी तंवर का विवाह जैसलमेर की राजकुमारी मैनादे के साथ हुआ l अजमल जी तंवर पोकरण के राजा बने l उनको कोई संतान नहीं थी l राजा अजमल जी द्वारिकाधीश जी के परमभक्त थे l वे हमेशा राज्य की सुख शांति की मनोकामना से द्वारिका जाते थे l

एक बार उनके राज्य में भयंकर अकाल पड़ा l वे राज्य में अच्छी बारिश की मनोकामना लेकर द्वारिका गए l कहते है भगवान द्वारिकाधीश की कृपा से उनके राज्य में बहुत अच्छी बारिश हुई l बारिश होने की अगली सुबह किसान अपने अपने खेतों को जा रहे थे, रास्ते में उनको राजा अजमल जी मिल गए, किसान वापस अपने घरों की तरफ जाने लगे l राजा ने वापस जाने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया की महाराज आप निसंतान है इसलिए आपके सामने आने से अपशकुन मानकर वे वापस लौट रहे है l

राजा को यह सुनकर बहुत दुःख हुआ लेकिन अजमल जी ने किसानो को कुछा नहीं कहा, वे वापस घर आ गए और काफी निराश हुए l उन्होंने संतान प्राप्ति की मनोकामना से द्वारिकाधीश के दर्शन हेतु जाने का निश्चय किया l वे भगवन द्वारिकाधीश के प्रसाद हेतु लड्डू लेकर गए l मंदिर में पहुचकर राजा अजमल जी ने अत्यंत दुखी होकर भगवन द्वारिकाधीश की मूर्ति के सामने अपना सारा दुख कहा l अपना दुखड़ा भगवन को सुनाने के बाद राजा अजमल जी ने बड़ी याचक दृष्टि से भगवन की मूर्त को देखा !भगवन की मूर्ति हसती हुई सी देखकर अजमल को गुस्सा आया और उन्होंने लड्डू फेका, जो मूर्ति के सिर पर जा लगा l

यह सब देखकर मंदिर का पुजारी अजमल जी पागल समझकर बोला की भगवन यहाँ नहीं है भगवन तो समुद्र में सो रहे है l अगर आपको उनसे मिलाना है तो समुद्र में जाओ l राजा अजमल जी बहुत दुखी होने के कारण पागलपन से समुद्र के किनारे गए और समुद्र में कूद गए l भगवन द्वारिकाधीश ने राजा अजमल को समुद्र में दर्शन दिए और कहा की वे खुद भादवा की दूज की दिन राजा अजमल के घर पुत्र रूप में आयेंगे l राजा अजमल ने देखा की भगवन के सिर पर पट्टी बंधी थी l

राजा अजमल जी ने पूछा भगवन आपको और ये चोट l भगवन ने कहा मेरे एक भोले भक्त ने लड्डू की मारी l यह सुनकर अजमल जी शर्मिंदा हुए l राजा अजमल जी भगवन से बोले भगवन मुझ अज्ञानी को कैसे पता होगा की आप ही मेरे घर आये है l तो भगवन ने कहा जब मैं तेरे घर आउगा तो आँगन में कुमकुम के पैरों के निशान बन जायेंगे, मंदिर का शंख अपने आप बजने लगेगा l

राजा अजमल जी ख़ुशी ख़ुशी घर लौटे और रानी को सारी बात बताई l कुछ दिन बाद राजा अजमल के घर एक लड़का हुआ जिनका नाम ब्रिह्मदेव रखा गया l भगवन के कहे अनुसार ही भादो शुक्ल पक्ष दूज के दिन वि•स• 1409 को भगवन द्वारिकाधीश ने राजा अजमल के घर बाबा रामदेव पीर के रूप में अवतरित हुए l

हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक बाबा रामदेव ने अपने अल्प जीवन के तेंतीस वर्षों में वह कार्य कर दिखाया जो सैकडो वर्षों में भी होना सम्भव नहीं था। सभी प्रकार के भेद-भाव को मिटाने एवं सभी वर्गों में एकता स्थापित करने की पुनीत प्रेरणा के कारण बाबा रामदेव जहाँ हिन्दुओ के देव है तो मुस्लिम भाईयों के लिए रामसा पीर। मुस्लिम भक्त बाबा को रामसा पीर कह कर पुकारते हैं। वैसे भी राजस्थान के जनमानस में पॉँच पीरों की प्रतिष्ठा है जिनमे बाबा रामसा पीर का विशेष स्थान है।

बाबा रामदेव ने छुआछूत के खिलाफ कार्य कर सिर्फ़ दलितों का पक्ष ही नहीं लिया वरन उन्होंने दलित समाज की सेवा भी की। डाली बाई नामक एक दलित कन्या का उन्होंने अपने घर बहन-बेटी की तरह रख कर पालन-पोषण भी किया। यही कारण है आज बाबा के भक्तो में एक बहुत बड़ी संख्या दलित भक्तों की है। बाबा रामदेव पोकरण के शासक भी रहे लेकिन उन्होंने राजा बनकर नहीं अपितु जनसेवक बनकर गरीबों, दलितों, असाध्य रोगग्रस्त रोगियों व जरुरत मंदों की सेवा भी की। यही नहीं उन्होंने पोकरण की जनता को भैरव राक्षस के आतंक से भी मुक्त कराया।

 

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