सामाजिक संस्थाओ के चुनाव पैनल/ग्रुप/दल रहित हो, प्रत्याशी सेल्फ हेल्प से ही चुनाव लडे

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दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (नवरत्न गुसाईवाल) । मेरे आस-पास के विद्वान जानकार अक्सर कहते रहते है कि सामाजिक संस्थाओ के चुनाव पर लेख लिखूं कि समाज की संस्थाओ के चुनाव पैनल/ग्रुप/दल रहित हो l पैनल/ग्रुप/दलगत चुनाव होने के कारण संस्थाओं में पारदर्शी व्यवस्था लागू नहीं हो पाती l क्योंकि एक किसी पैनल/ग्रुप/दल के नीचे चुनाव जीतकर आने वाला सामान्य सदस्य या कोई पदाधिकारी दल के मुखिया के किसी भी गलत-सही निर्णय का विरोध नहीं कर पाता है l

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सामाजिक संस्थाओ में समय-समय पर होने वाले चुनाव किसी एक पैनल/ग्रुप/दल के नीचे होने के कारण समाज में आपसी बैर-भाव और कटुता बढ़ा रहे है और इसके कारण समाज का आपसी भाईचारा भी प्रभावित होता है l

सामाजिक संस्थाओं के हित में ज्यादा बेहतर यह होगा कि लोग व्यक्तिगत पहचान के आधार पर चुनाव लड़ें, ताकि वह संस्थाओं के निर्णय में गलत को गलत और सही को सही कहने का साहस जुटा सकें l यदि हमे समाज में परिवर्तन करना है तो इसी विचार को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से समाज के सभी सम्मानित मतदाताओं के लिए भी संदेश है, कि पक्ष-विपक्ष की बात भूलकर हम ऐसे प्रत्याशियों को चुनें, जिनकी स्वच्छ छवि हो और जो ईमानदारी के साथ अपनी जिम्मेदारी निभा सकें, और बदलते वक्त के साथ संस्था के कामकाज में भी पॉजिटिव बदलाव हो और हम एक बेहतर व्यवस्था तैयार कर सकें l ताकि चुनाव दर चुनाव होने वाले ओछे आरोप-प्रत्यारोपों की गुंजाईश हमेशा के लिए खत्म हो सके l

पैनल/ग्रुप/दल में चुनाव लड़ने वाले भले ही हमारे लोग है लेकिन उनकी विचारधारा हमारी नहीं है । जब कोई प्रत्याशी किसी का सहारा लेता है तो उसे उस पैनल/ग्रुप/दल का इशारा भी मानना पड़ेगा । हम इस व्यवस्था के दुख से भोगी है और यह हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है । हमारे बहुत से मतदाता अनपढ़ या अज्ञानी हैं या फिर उन्हें इस बात की जानकारी का अभाव है l सूचनाविहीन इंसान ग़ुलाम होता है । वो सिर्फ मालिक की बात सुनता है । मालिक की बात समझ सकता है । मालिक जो भी करे, उसे मालिक की नीयत साफ-सुथरी और अच्छी लगती है। इसलिए सामाजिक संस्था का चुनाव प्रत्याशी द्वारा सेल्फ हेल्प से ही लड़ा जाये, और जो प्रत्याशी चुनाव लडे उसमे समाजहित की भावना ही सर्वोपरि होनी चाहिए l

सभी सम्मानित मतदाता किसी भी पैनल/ग्रुप/दल विशेष को विजयी बनाने की बजाय अगर अच्छे, सच्चे और नेक प्रत्याशियों को चुनें तो संस्था के लिए ज्यादा हितकारी होगा l किसी पैनल/ग्रुप/दल विशेष या आदमी विशेष में बदलाव ढूंढने की बजाय हम संस्था में बदलाव के वाहक बनें l जब हम योग्य, ईमानदार तथा कर्मठ प्रत्याशी चुनेंगे तो स्वत: ही ऐसी मजबूत व्यवस्था तैयार कर पायेंगे, जिसमें जो भी व्यक्ति राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठेगा, वह संस्थाहित से अलग हटकर अपने हित पूरे कर पाने की बात नहीं सोच पायेगा l

(सामाजिक चुनाव व्यवस्था पर यह मेरे निजी विचार है, आप सबके अलग अलग विचार हो सकते हैं l)

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार है, व्यक्त किए गए विचार समाजहित एक्सप्रेस के नहीं हैं, तथा समाजहित एक्सप्रेस उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है l

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