*वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्णता व नारी स्वतंत्रता*

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दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (लेखिका चन्द्रकांता सिवाल “चन्द्रेश”) । जिस उद्देश्य के साथ महिला दिवस मनाने का निर्णय हुआ और शुरुआत हुई क्या उसकी सार्थकता पर हम विचार करते हैं ? हर वर्ष महिला दिवस मनाते हैं और बड़ी-बड़ी बाते कर अगले वर्ष की तैयारी में लग जाते हैं। महिला के अधिकार की बात कौन करे हम महिला के अधिकार का हनन करने में लगे रहते हैं। यही प्रक्रिया रही तो कैसे होगा आधी आबादी का विकास कैसे पूरा होगा महिला दिवस मनाने का औचित्य पूरा। महिला अधिकार के हनन को रोकना होगा और उसके समुचित विकास की बात करनी होगी।
आधी आबादी के विकास में कहीं न कहीं उसके अधिकारों का हनन उसके सम्पूर्ण विकास को प्रभावित करता है। देश में आधी आबादी के एक बड़े हिस्से के व्यक्तिगत जीवन के सारे निर्णयो का संचालन भी उनके परिवार व समाज के नियंत्रण में ही है। व्यवहारिक रूप से समाज के भीतर झांके तो पाएंगे कि महिलाओं को उनके कानूनी हक को देना भी हम गवारा नहीं करते,उनका कानूनी हक देते भी है तो कृपा के तौर पर। भले ही संसद में वर्षो पूर्व उठा महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का मुद्दा अभी तक कूड़ादान में पड़ा हुआ है मगर पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं के लिए 50 फ़ीसदी आरक्षण देकर उनके विकास रथ को आगे बढ़ाने का प्रयास तो किया ही गया है। पंचायती राज में महिलाएं प्रधान, मुखिया,सरपंच,समितियों के अध्यक्ष तो बनी लेकिन वह कितना स्वतंत्र है कोई निर्णय लेने में,कितनी आजादी है कोई फैसला लेने में उन्हें यह एक अहम सवाल है। उनके परिवार के सदस्य सारे कार्यों का निपटारा खुद करते हैं वह केवल हस्ताक्षर के अधिकारी है मात्र है वो भी सम्पूर्ण रूप से नही,कहीं-कहीं तो उनके हस्ताक्षर भी उनके पति पुत्र व अन्य संबंधी ही करते हैं। क्षेत्र के विकास और समस्याओं के निष्पादन तथा विकास की योजनाओं को तय करने के लिए आहूत पंचायत समिति,ग्राम पंचायत व आम सभा की बैठकों में भी उनके परिवार के सदस्य भाग लेते हैं और वही विकास का मुद्दा तय करते। यही नही समाज के लिये गंभीर समस्या भ्रूण हत्या के मामले में भी पूर्ण अधिकार होते हुए भी महिलाओ की नही चलती और अपने पुरुष साथी के निर्णय को मानना पड़ता है उन्हें और अपनी ममता का न चाहते हुए भी गला घोटना पड़ता है। भारत मे स्त्रियां आर्थिक मामलो में पुरुषों के अधीन तो हैं ही सार्वजनिक जीवन मे भी पुरुषों के अधीनस्थ है। जब तक महिला अधिकारों के हनन का मामला नहीं सुलझेगा,जबतक पुरुष महिलाओं को जागृत प्रोत्साहित कर उन्हें स्वतंत्र मौका नही देगा तबतक आधीआबादी के संपूर्ण विकास की बात अधूरी व बेमानी होगी। संसद में आधी आबादी के 33% आरक्षण का मामला ऐसे ही लटका हुआ है और ऐसे में आधीआबादी के अधिकारों के हनन की चर्चा होती रही तो यह भी एक उसके खिलाफ बहस के लिए एक बिंदु हो सकती है। आधी आबादी के विकास की बात करनी है तो महिला अधिकार, महिला की स्वतंत्रता के संदर्भ में गंभीरता से सकारात्मक रुख अपनाना होगा हमें उनका अधिकार हक देना होगा समाज की मानसिकता बदलनी होगी, तभी आधी आबादी का सम्पूर्ण विकास हो पाएगा। कानून हमारे यहां है लेकिन उसी परिणति क्या होती है हम सबको मालूम है।निश्चित तौर पर स्त्री को अधिकार मिलने में कानून,कागज और व्यवहारिकता के बीच खाई को पाटना होगा। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तस्वीरों का रूप महिलाएं बदल रही हैं जरूरत है हम भी उन्हें मौका दे। नेतृत्व के निचले पायदान पंचायती राज चयनित महिलाओं को स्वतंत्र रूप में कार्य करने का मौका दिया जाय अगर कहीं पे कमजोर लग रही तो उनकी मदद की जाये।
       महिला दिवस की मनाने की जरूरत ही आधी आबादी के विकास की मांग से शुरू हुई है ऐसे में जब भी हम इस अवसर को मनाते है हमे महिला विकास के प्रति नयी और सकारात्मक सोच के साथ विकास की रणनीति तय करनी है। आधी आबादी के समुचित विकास के लिये शिक्षा पर विशेष ध्यान देना होगा,महिलाओं को सामाजिक राजनीतिक क्षेत्र में आगे  लाकर सक्रिय भूमिका निभाने की क्षमता भरनी होगी, तभी हम नारी शक्ति की स्वतंत्रता एवं महिला दिवस की पूर्णता को कायम कर पाएंगे।

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