सामाजिक संस्थाओ के त्रिवार्षिक चुनाव में सामाजिक विकास के मुद्दों के बजाय ‘बदजुबानी’ हावी रही

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दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगाँवलिया) । रैगर समाज के लोगो द्वारा दो प्रमुख सामाजिक संस्थाओ के त्रिवार्षिक चुनाव को याद रखा जाएगा, क्योंकि समाज की राजनीति से स्वामी आत्माराम जी “लक्ष्य” युग की शालीनता समय के साथ धीरे-धीरे समाप्त होने लगी है । मौजूदा समय में परिदृश्य काफी बदला-बदला सा है,चुनाव प्रचार के दौरान कुछ जिम्मेदार लोगों ने मर्यादा विहीन टिप्पणी और प्रतिक्रियाएं सोशल मीडिया पर कर एक-दूसरे की निजता पर हमले किये l सामाजिक मतदाताओं को धमकाने व भटकाने के प्रयास किये l चुनाव के मैदान में समाज विकास के मुद्दों पर प्रतिक्रियाएं तो होती आई है, लेकिन जिस तरह से निजता पर हमला किया गया, वह उनकी विकृत मानसिकता की परिचायक है जिसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा l

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आजकल राजनीति हो या फिर सामाजिक राजनीति हर जगह विचारो की नैतिकता का पतन बहुत तेजी से हो रहा है l किसी को किसी के मान मर्यादा की चिंता नही है l सभी अपने पैमाने पर नैतिकता को परिभाषित कर रहे है और कुछ उसी के अनुरूप आचरण भी कर रहे है l लोगो के आचरण में सामाजिक मान- सम्मान और इज्जत-आबरू को नजर अंदाज करने की प्रवृति बढ़ रही है l जिसको जहाँ अवसर मिल रहा है वह वही सामाजिक लाज,शर्म,हया की हदे पार कर, अधिक से अधिक सामाजिक मर्यादाओं को लाँघने की कोशिश कर रहा है l अगर इसी तरह सामाजिक और चारित्रिक नैतिक मूल्यों में गिरावट होती रही तो कल का समाज आज के समाज से कही ज्यादा असुरक्षित और भयावह हो जायेगा जो किसी सभ्य समाज का विकृत सामाजिक रूप होगा l इस अनिच्छित परिवर्तन के लिए जिम्मेदार होगे आज के सामाजिक और राजनैतिक कर्णधार जिनके कन्धो पर नैतिक सुसभ्य समाज के निर्माण की जिम्मेदारी है l

हर छोटे व बड़े मुद्दों पर अपनी बात या राय जाहिर करने का सोशल मीडिया बेहतर मंच साबित हुआ है, मगर वैचारिक अतिवाद की वजह से इसका दुरूपयोग भी खूब हो रहा है । असल में तो समाज के चुनाव में सामाजिक विकास के मुद्दे हावी होते हैं और उन पर बहस होती है l लेकिन हाल के दिनों में सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों पर समाज के कुछ जिम्मेदार लोगों ने अपनी गरिमा को भुलाकर अपनी प्रतिक्रियाओ और कमेंटो में आचरण विहीन जुबानी जंग का अखाड़ा बना दिया है । इसके जरिए प्रत्याशियों के समर्थक और विरोधी गाली-गलौज भी करते नजर आ रहे थे । इस चलन से हम सभी को बचने की जरूरत है ।

किसी भी व्यक्ति को अपनी तरह की स्वतंत्र जिंदगी जीने की अनुमति भारतीय कानून देता है l किसी भी बात पर असहमती की दशा में हमें सहनशील हो कर अपने विचार रखने की जरूरत है । विरोध और समर्थन का तरीका सभ्य होना चाहिए । अभिव्यक्ति की आजादी के तहत असहमति का अधिकार लोकतंत्र में सभी को है मगर संवैधानिक दायरे में रह कर ।

जब तक रैगरों का प्रतिनिधित्‍व समाज और राजनीती में अधिक रहा, तब तक समाज में टकराव की ऐसी स्थिति नहीं बनी । आज उसी इतिहास से प्रेरणा लेते हुए वर्तमान और भविष्‍य के अनेक चुनौतियों से निपटने के लिए जरूरत है ।

 

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