स्नेहा पहली प्रामाणिक ‘‘भारतीय’’ नागरिक, प्रमाण-पत्र हासिल करने में 09 साल संघर्ष करना पड़ा

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दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगाँवलिया) । मनुवादी भारतीय सामाजिक व्यवस्था के जातिवादी किले को ध्वस्त करने की मुहिम आधुनिक भारत में 1848 में ज्योति राव फुले ने न्याय और सामाजिक समानता के नए बीज बोकर शुरूआत की । उनका मानना था कि ऐसा किए बिना नए समाज की रचना नहीं की जा सकती है । नए समाज के बिना भारत का विकास संभव नहीं है, तो सबसे पहले जाति-धर्मों के नाम पर खुद को बांटने का काम बंद करना होगा । ये अच्छे राष्ट्र का निर्माण होने में सबसे बड़े बाधक है l राष्ट्रीयता के उसी जज्बे से ओतप्रोत एक महिला ने देश में पहली बार ‘नो कास्ट नो रिलीजन’ प्रमाणपत्र हासिल करके देश की पहली ‘भारतीय’ नागरिक होने का गौरव हासिल किया है ।

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प्राप्त जानकारी के मुताबिक तमिलनाडु के वेल्लूर की रहने वाली 35 वर्षीय स्नेहा पेशे से वकील है और उसने वर्ष 2010 में इस सर्टिफिकेट के लिए आवेदन किया था लेकिन अधिकारी उनके आवेदन को टालते रहे । स्नेहा अपने आवेदन पर डटी रहीं और संबंधित विभागों में लगातार चक्कर लगाती रहीं । स्नेहा का सवाल था कि, अगर जाति और धर्म को मानने वाले लोगों को उनकी संबंधित जाति का प्रमाणपत्र दिया जा सकता है, तो उन्हें किसी जाति अथवा धर्म से संबंधित न होने का प्रमाणपत्र क्यों नहीं दिया जा सकता ?  उनकी मेहनत आखिरकार रंग लाई, जब तिरूपत्तूर की उप जिलाधिकारी बी प्रियंका पंकजम ने सबसे पहले उनकी भावनाओं को समझा और उसके बाद उन्हें यह प्रमाणपत्र देने की प्रक्रिया शुरू की ।

भारतीय समाज में कहा जाता है कि जाति कभी नहीं जाती l इस धारणा को तोड़ने की औपचारिक तौर पर शुरुआत हुई और स्नेहा के जन्म प्रमाणपत्र से लेकर स्कूल में दाखिले के फार्म और तमाम दस्तावेजों में जाति और धर्म वाले कॉलम में ‘भारतीय’ लिखा है और जब जांच की गई तो उनके दावे सही पाए गए । तब उन्हें ‘नो कास्ट नो रिलिजन’ सर्टिफिकेट देने का फैसला किया गया । स्नेहा का मानना है कि जाति और धर्म कुछ नहीं होता और हर इंसान को इन सब से अलग होकर अपनी एक पहचान बनानी चाहिए ।

आखिरकार 9 साल के बाद 5 फरवरी 2019 को स्नेहा को तिरूपत्तूर के तहसीलदार टी एस सत्यमूर्ति से ‘नो कास्ट, नो रिलिजन’ का यह अनोखा प्रमाणपत्र हासिल हुआ l देश में पहली बार एक महिला ने ‘नो कास्ट नो रिलीजन’ प्रमाणपत्र हासिल करके देश की पहली ‘भारतीय’ नागरिक होने का गौरव हासिल किया है ।

स्नेहा के माता पिता ने इस अनोखी परंपरा की शुरूआत की और उन्होंने खुद कभी अपनी जाति और धर्म का खुलासा नहीं किया। वह अपने बच्चों के जन्म प्रमाणपत्र से लेकर स्कूल में दाखिले तक किसी भी फॉर्म में जाति एवं धर्म वाला कॉलम खाली छोड़ देते थे।

स्नेहा के पति पार्थिब राजा तमिल प्रोफेसर हैं। उनका कहना है कि उन्होंने अपनी तीनों बेटियों के स्कूल में दाखिले के समय ‘‘धर्म’’ का कॉलम खाली छोड़ दिया। उन्होंने अपनी बेटियों के नाम भी ऐसे रखे हैं कि उससे उनके किसी धर्म विशेष से संबद्ध होने का पता नहीं चलता। उनकी बेटियों का नाम है अधिराई नसरीन, अधिला इरीन और आरिफा जेसी।

स्नेहा कहती हैं कि स्कूल से लेकर कॉलेज की पढ़ाई और अन्य कई मौकों पर उन्हें फार्म के धर्म और जाति का नाम लिखने के लिए बाध्य किया जाता था और न लिखने पर हलफनामा लाने को कहा जाता था । उन्हें खुशी है कि अब उन्हें सरकारी तौर पर ‘‘भारतीय’’ मान लिया गया है । ढेरों धर्मों, जातियों, समुदायों और वर्गों में बंटे समाज की वह पहली प्रामाणिक ‘‘भारतीय’’ नागरिक हैं ।

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