राजस्थान के पुष्करणा ब्राह्मण समाज के चोवटिया जोशी जाति के लोग होली का उत्सव नहीं मनाते

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दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस । राजस्थान में 1752 से आजतक पुष्करणा जाति के चौवटिया जोशी समाज के लोग केवल पोकरण में ही नहीं, बल्कि चौवटिया जोशी परिवार के लोग भले ही दुनिया के किसी भी कोने में रहते हों होली नहीं मनाते हैं, न तो होलिका दहन करते हैं, न पूजन करते हैं और न ही इस पर्व पर इनके घरों में पकवान बनते हैं और न ही बच्चों की ढूंढ पूजते हैं। वे होली के रंगों से सराबोर नहीं होते हैं।

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प्राप्त जानकारी के मुताबिक, जहां भारतवर्ष में होली धूमधाम से मनाई जाती है। वहीं, राजस्थान के पुष्करणा ब्राह्मण समाज के चोवटिया जोशी जाति के लोग होली के अवसर अपर खुश होने की जगह शोक मनाते हैं। इनके घरों में खाना नहीं बनता । यह लोग दूर के रिश्तेदारों के यहां से आने वाले भोजन से निर्वाह करते हैं । होली के अवसर पर इस पारम्परिक मातम के पीछे भी उनका एक इतिहास है।

होली की घटना 1752 की है फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि माड़वा (पोकरण) राजस्थान गांव में होलिका दहन का उत्सव था। सैकड़ों ग्रामीण की मौजूदगी में धधकती होली की लोग परिक्रमा दे रहे थे वहीँ हरखाजी जोशी की पत्नी लालाबाई अपने छोटे बेटे भागचंद को गोदी में लेकर होल‌िका की परिक्रमा कर रही थी कि भागचंद अपनी माँ की गोद से उछलकर होलिका की आग में गिर गया। अपने बच्चे की रक्षा करने के लिए मां भी अग्नि में कूद गई और दोनों की मौत हो गई । उसी दौरान आकाशवाणी हुई कि भविष्य में चौवटिया जोशियों की संतान और कुल वधुएं होली की पूजा न करें, होली की झाल (लपटें) न देखें और न ही होली पर पकवान पकाएं। तब से पुष्करणा ब्राह्मण समाज की इस चोवटिया जाति के लिए होली मातम का पर्व हो गया। इस समुदाय के लोग घरों में चूल्हा तक नहीं जलाते, खाने-पीने की सारी सामग्री नाते-रिश्तेदारों के घरों से आती है l इस समाज के लोग होली के दौरान वे सभी रस्में निभाते हैं जो घर में किसी की मृत्यु होने पर निभाई जाती हैं l

अब अगर किसी भी चोवटिया जोशी परिवार में होलिका दहन के दिन लड़के का जन्म हो और वह लड़का पूरे एक साल तक जिंदा रहे और अपनी माँ के साथ जलती हुई होलिका की परिक्रमा कर होलिका की पूजा करे तो ही इस जाति के लिए होली का पर्व हँसी-खुशी के साथ मनाना संभव होगा। इसे चमत्कार कहेंगे या संयोग कि इस दुर्घटना को हुए आज सैंकड़ों साल हो गए हैं लेकिन आज तक चोवटिया जोशियों के किसी भी परिवार में होलिका दहन के दिन किसी लड़के का जन्म नहीं हुआ हैl

पुत्र वियोग में प्राण देने वाली लालाबाई का मंदिर है माड़वा में होलिका दहन के दौरान पुत्र के वियोग में होली के कुंड में लालाबाई मां कूद गई थीं। उन्हीं के नाम से मंदिर विख्यात है। माड़वा गांव में मां का मंदिर भी है। पोकरण के चोवटिया जोशी आज भी मां की पूजा करने के लिए माड़वा गांव जाते हैं, वहीं आज भी मां को पूजा जाता है तथा चोवटिया जोशी होली के त्योहार पर न तो घरों में मिष्ठान्न बनाते हैं और न ही होली दहन के दौरान छौंका लगाते हैं।

पुष्करणा ब्राह्मण समाज का बाहुल्य बीकानेर, जोधपुर, पोकरण, फलौदी, जैसलमेर में है और इसके साथ ही साथ भारत भर में इस जाति के लोग रहते हैं और यह परम्परा पूरे भारतवर्ष में निभाई जाति है। जोधपुर, पोकरण, बीकानेर में तो यह परम्परा भी किसी समय रही है कि होलिका दहन से पूर्व जोर का उद्घोष कर आवाज लगाई जाती थी कि अगर कोई चोवटिया जोशी है तो वह अपने अपने घर में चला जाए क्योंकि होलिका दहन होने वाला है।

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