दलित वर्गों के समर्थक व पूर्व उप-प्रधानमंत्री बाबू जगजीवन राम जी की 111वीं जयंती पर विशेष

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दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगाँवलिया) ।

जब-जब भारत की आजादी की लड़ाई का जिक्र होगा, देश के दबे कुचले समाज के उत्थान की चर्चा होगी, या दलितों के हक-हकूक की लड़ाई की बात निकलेगी, एक नाम जिससे सुनहरी शब्दों में याद किया जाएगा वो हैं बाबू जगजीवन राम, जिन्हें पूरा भारत ‘बाबूजी’ पुकारता है l एक राष्ट्रीय नेता स्वतंत्रता सेनानी, सामाजिक न्याय के योद्धा, दलित वर्गों के समर्थक, उत्कृष्ट सांसद, सच्चे लोकतंत्रवादी, उत्कृष्ट केंद्रीय मंत्री, योग्य प्रशासक और असाधारण मेधावी वक्ता थे।

बाबू जगजीवन राम का जन्म 5 अप्रैल, 1908 को बिहार राज्य के चंदवा क्षेत्र में हुआ था जिन्हें स्नेहपूर्वक बाबूजी के नाम से जाना जाता था l उनका परिवार आर्थिक तौर पर बेहद कमजोर था। अपनी प्रारंभिक शिक्षा के लिए स्थानीय स्कूल में पढ़ने के बाद बाबू जगजीवन राम माध्यमिक शिक्षा और बाद में उच्च शिक्षा पूरी की। यही वो समय था जब पहली बार उनका सामना जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता से हुआ और इन अनुभवों ने उनके जीवन पर गहरा प्रभाव डाला। हालाँकि, इनके चलते वे अपने लक्ष्यों से विचलित नहीं हुए, इन जीवंत अनुभवों ने बाद में उन्हें सामाजिक न्याय के लिए अपनी निःस्वार्थ लड़ाईयों और शोषित वर्गों के लिए बराबरी को बढ़ावा देने के उनके संकल्प को मजबूती दी।

बाबू जगजीवन राम को स्कूली दिनों में धार्मिक अलगाव और छुआछूत की प्रथा के खिलाफ विरोध करने के लिये जाना जाता है। उनके स्कूल में विद्यार्थियों के पीने के पानी के लिए दो अलग-अलग घड़े थे, जिनमें से एक विशेष रूप से हिंदुओं का था और दूसरा मुसलमानों का। जब बाबू जगजीवन राम ने पहले घड़े से पानी पीया तो अछूत जाति के होने के कारण स्कूल में आक्रोश फैल गया और इस घटना की शिकायत स्कूल के प्रधानाचार्य तक पहुंची। इसका समाधान निकालते हुए वहां तीसरे बर्तन की व्यवस्था की गयी जो अछूत लोगों के लिये था। भेदभाव और असमानता को और बढ़ाने वाले इस कदम को देखकर बाबू जगजीवन राम ने विरोध जताया और अछूत घड़े को तोड़ दिया।

बाबू जगजीवन राम ने अपने छात्र जीवन में भेदभाव के खिलाफ काफी संघर्ष किया, एक घटना में दलित होने के कारण नाईयों ने भी उनके बाल काटने से इनकार कर दिया था। शैक्षिक तौर पर मेधावी छात्र होने के बावजूद उनको बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में भोजन और अन्य बुनियादी छात्र सुविधाओं से वंचित कर दिया गया था। इस घटना के बाद उन्होंने परिसर में अनुसूचित जाति को मजबूत करने और विभिन्न तरह की असमानता और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया और ये काम उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय में जारी रखा। 1928 में कलकत्ता के वेलिंगटन स्क्वायर की मजदूर रैली में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने बाबू जगजीवन राम की प्रतिभा को पहचाना।

दलित अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने वाले राजनीतिक प्रदर्शनों में भाग लेने के अलावा, बाबू जगजीवन राम ने मानवीय प्रयासों में भी भाग लिया। उन्होंने 1934 में बिहार में आये भयावह भूकंप में बड़े पैमाने पर राहत कार्य किया। छुआछूत, असमानता और उत्पीड़न के खिलाफ उनके संघर्ष ने समाज सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अंततः बाद के वर्षों में विभिन्न तरीकों से इसके सुखद परिणाम सामने आये।

जून, 1935 में बाबूजी का विवाह इंद्राणी देवी से हुआ था। इंद्राणी देवी स्वयं एक स्वतंत्रता सेनानी और शिक्षाविद थीं। 17 जुलाई, 1938 को उनके पुत्र सुरेश कुमार और 31 मार्च, 1945 को पुत्री मीरा कुमार का जन्म हुआ।

वर्ष 1937 में बिहार विधान सभा का सदस्य बनने के बाद उनको ग्रामीण श्रमिकों के कल्याण हेतु समर्पित जनांदोलनों के लिये भी जाना जाता है। बाबू जगजीवन राम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख सदस्य थे, जहां उन्होंने समर्पित भाव से चालीस साल से अधिक समय तक पार्टी के विभिन्न पदों पर काम किया, इसके बाद वे 1977 से 1979 तक भारत के उप-प्रधानमंत्री भी बने।

1946 से लेकर 1986 निरतंर 40 वर्षों तक सासाराम संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर उन्होंने विश्व कीर्तिमान बनाया। 6 जुलाई 1986 को दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में उनका देहांत हुआ। तीन दिनों तक देशव्यापी शोक मनाया गया।

 

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