आधुनिक युग में बढ़ते एकल परिवार का परिणाम असुरक्षा और तनाव

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पिता का मर्डर हो गया,पत्नी किसी और की हो गई, बालक अनाथ हो गया, पुलिस ने समझाया और घर पहुंचाया।

दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगाँवलिया) । संयुक्त परिवार जो कभी भारतीय सामाजिक व्यवस्था की नींव हुआ करते थे, आज पूरी तरह विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि बदलते आर्थिक परिवेश में लोगों की प्राथमिकताएं मुख्य रूप से प्रभावित हो रही हैं. मनुष्य का एकमात्र ध्येय केवल व्यक्तिगत हितों की पूर्ति करना ही रह गया है। अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए वह अपने परिवार के साथ को भी छोड़ने से पीछे नहीं रहता। इसके अलावा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बढ़ती मांग भी परिवारों के टूटने का कारण बनती है। लेकिन संयुक्त परिवारों के विघटन और एकल परिवारों के उद्भव का सबसे बड़ा प्रभाव परिवार के बच्चों पर पड़ा है ।

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घटना अलवर जिले के बड़ौदामेव थानां क्षेत्र की है सुबह के वक्त एक चौदह वर्षीय बालक बडोदामेव थाने के सामने लावारिस घूम रहा था। थाना प्रभारी सुरेंद्र मलिक थाना परिसर से उस बालक को देख रहे थे। पुलिस वाला होने के नाते बालक की मनोदशा को भांपने को उत्सुक हुआ l थानाप्रभारी सुरेंद्र मलिक उस बालक के पास गए और उसे थाने में अपने चेम्बर में ले आए।

थाना प्रभारी सुरेंद्र मलिक ने बच्चे के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए उसे पानी पिलाया और फिर चाय बिस्कुट मंगा कर दी l इसी दौरान बच्चे के साथ बैठे बैठे उसके चेहरे पर चल रहे आवभाव को जानने का प्रयास किया। बालक को थाना प्रभारी मलिक की खाकी वर्दी में भी अपनापन लगने लगा।

चौदह वर्षीय बालक थाना प्रभारी सुरेंद्र मलिक से बोला, अंकल आप मुझे पिटोगे तो नहीं। सुरेंद्र मलिक ने कहा अरे नहीं बेटे ..….. अंकल असल बात यह है कि मेरा नाम आदित्य है और मेरे दादा का मकान लंगड़ा बाबा की दुकान, कचहरी रोड, अलवर पर है। मेरे पिताजी की कुछ समय पूर्व हत्या हो चुकी है l

जब मैने होश संभाला तो मेरी मॉर्डन माँ ने किसी का हाथ पकड़ लिया और मुझे दादा-दादी के पास छोड़कर फरार हो गई। दादा ने आज मुझे डांटा तो मेरे दोस्त से किराया लेकर बडोदामेव पहुंच गया लेकिन अब नाना के घर जाने का रास्ता नहीं मिल रहा है। थानाप्रभारी ने बालक को समझाया और हिदायत देते हुए कहा कि बेटे आपको कभी भी परिजनों को बिना बताए घर से नहीं निकलना चाहिए मैं आपको आपके से मिलवा दूंगा और बालक आदित्य खुश हो गया ।

थानाप्रभारी ने नाना संपतराम निवासी निजाम नगर को थाने बुलाकर बालक को नाना के सुपुर्द किया। इस मामले में गनीमत यह रही की समय रहते बालक पुलिस के हाथ लग गया और वह सकुशल नाना के पास पहुंच गया।

लोग कहते है माँ ताउम्र अपने बच्चों की खातिर ही जीती है और अपने बच्चे की परवरिश के लिए मेहनत-मजदूरी भी कर बच्चे को कामयाब इंसान बनाने का हरसम्भव प्रयास करती है लेकिन इक्कीसवीं सदी में शायद ऐसी मॉ………..सभी को नसीब होती होगी।

पिछले दिनों शिवाजी पार्क थाने के इलाके में एक माँ की बर्बरता किसी से छुपी नहीं है मात्र प्रेमी के साथ रहने के लिए अपने ही खोख से जन्मे बच्चों की निर्मम हत्या कर माँ की ममता की धज्जियां उड़ाकर माँ शब्द को ही कलंकित कर दिया था ।

एकल परिवारों के प्रति बढ़ती दिलचस्पी के पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि पति-पत्नी दोनों ही अब स्वतंत्र रहना चाहते हैं, जिसके चलते खुद से संबंधित किसी भी मसले में दूसरे व्यक्ति का हस्तक्षेप सहन नहीं किया जाता। लोगों की संकीर्ण होती मानसिकता भी ऐसे छोटे-छोटे और सीमित परिवारों के विकास में काफी सहायक होती हैं। सामुदायिक हितों की बात ही छोड़िए, अपने माता-पिता की जिम्मेदारी भी मनुष्य को बोझ लगने लगी है l असल में एकल परिवार की ही परिणीति है कि परिवार- बालक संस्कारहीन हो रहे है।

एक-दूसरे से दूर रहने की वजह से पारिवारिक सदस्यों में आपसी मेलजोल की भावना भी कम होने लगती है और धीरे-धीरे वह पूर्ण रूप से अपने ही परिवार से कट जाते हैं। जिसके फलस्वरूप उन्हें अपने ही संबंधियों के सुख-दुख से कोई वास्ता नहीं रहता। पहले जो तीज-त्यौहार में पारिवारिक सदस्यों की उपस्थिति उत्सवों में चार-चांद लगाया करती थी और एक साथ हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता था, आज वही त्यौहार अलग-थलग रहकर मात्र औपचारिकता पूरी करने के लिए ही अनमने ढंग से मनाया जाने लगा है।  आज वहीं उत्सव मात्र एक औपचारिकता बन कर रह गए हैं। मनुष्य ने खुशी और गम के सभी रास्ते, जो उसके पारिवारिक सदस्यों तक पहुंचते थे, उन्हें अब खुद ही बंद कर दिए हैं l

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