व्यंग्य लेख : हाशिए पर अटकी लटकी कार्यकर्ता की कर्मठता

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मोहन लाल मौर्य

वह कर्मठ कार्यकर्ता है। इसका प्रमाण पार्टी का हर वह बड़ा नेता है,जो उसे भले ही नाम से नहीं जानता हो,लेकिन शक्ल से अच्छी तरह से पहचानता हैं। जब भी कोई बड़ा नेता उसकी पीठ थपथपाता है,तो उसका सीना इतना चौड़ा हो जाता है कि नापे तो इंची टेप कम पड़ जाए। थपथपाने से पीठ भी इत्ती मजबूत हो गई है कि चुनाव का सारा भार उठा लेती है। दरी-पट्टी बिछाने में और कुर्सियां उठाने में तो जरा सी भी नहीं दुखती है। बल्कि मांसपेशियों को मजबूती प्रदान होती है।

धरना-प्रदर्शन के नेतृत्व कर्ता के नेतृत्व में पीठ ने पुलिस की लाठियां भी खूब खाई है। पर कभी भी पीठ नहीं दिखाई। भले ही खुद लहूलुहान हो जाए,मगर अपने लीडर के खरोंच तक नहीं आने देता है। पार्टी के प्रति यह उसकी सच्ची निष्ठा है। जिसको निभाए रखना अपना परम कर्तव्य समझता है। अपनी कार्यशैली पर कभी प्रश्नवाचक नहीं लग जाए, इसलिए पार्टी के हर कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर भाग लेता है। चुनावी समय में तो दिन-रात पार्टी के प्रचार-प्रसार में जुटा रहता है। उसकी यह उपस्थिति भी इस बात की गवाह है कि वह पार्टी का कर्मठ कार्यकर्ता है।

वह पार्टी के प्रति कितना समर्पित है। यह बताने की आवश्यकता नहीं है। उसके गले में लटका पार्टी के रंग में रंगा पट्टा और हाथ में उठाए हुए पार्टी के झंडे को देखकर ही पता लग जाता है। जब वह पार्टी के नाम के जिंदाबाद के नारेे लगाता है तो उसे देखकर बाकी कार्यकर्ताओं में अपने आप ही जोश आ जाता है। उसे कार्यकर्ताओं में जोश भरने का अग्रदूत कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

वह पुतले तो इस तरह से फूँकता हैं कि देखने वाले की फूँक निकल जाती है। उस समय कोई उसकी और आगे बढ़ता है तो फूँक-फूँक कर कदम रखता हैं। पता नहीं क्या कर डाले। आक्रोशित हो जाए। आक्रोश आक्रोश में जलते पुतले में पेट्रोल डालकर उसे और दहका दे। पार्टी को जब भी किसी का पुतला फूँकना होता है तो उसी से सींक लगवाते हैं। क्योंकि वह भली-भांति जानता है कि कब और किसके सामने पुतला फूँकना है। जब तक पुलिस और प्रेस वाले नहीं आ जाएं,तब तक तीली भी नहीं जलाता है।

पार्टी में उसके योगदान पर एक नजर डालें,तो उन माननीयों की खादी पर उसके योगदान की चमक अवश्य दिख जाएगी। जिनकी खादी पर पहलेे दाग लगे हुए थे और अब दाग का नामोनिशान नहीं है। और उनकी कुर्सी पर योगदान का बलिदान दिख जाएगा। जो जमीन से आसमान पर पहुँच गए हैं। जब भी चुनावी समय आता है तो इन सबको जिताने के लिए एड़ी से चोटी तक का जोर लगा देता है। खादी पर लगे हुए दागों को राजनीतिक साजिश बताकर ऐसी धुलाई कर देता है कि वोटर को कहीं पर दाग नजर ही नहीं आता है।

लेकिन जब उसने टिकट मांगा तो पार्टी ने उसे हाशिए पर धकेल दिया। उसकी जगह उसे टिकट दे दिया,जो विरोधी पार्टी से आकर शाम को ही पार्टी में सम्मिलित हुआ था। जिसे नहीं तो पार्टी की रीति-नीति पता है और नहीं पार्टी का इतिहास जानता है। मगर इससे कार्यकर्ता के ज्ञान चक्षु खुल गए। उसे ज्ञान हो गया। पार्टी में कार्यकर्ता,कार्यकर्ता ही रहता है। उसका कभी प्रमोशन नहीं होता है।

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