चंदे के लिए समाज याद आता है और चुनाव में गैर-समाज को समर्थन देते है, ऐसा समाज कैसे सांसद बना पायेंगा

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दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगाँवलिया) । रैगर समाज के तथाकथित कुछ लोगो के द्वारा अपने निजी लाभ के लिए अखिल भारतीय रैगर महासभा  के नाम का दुरूपयोग किया जा रहा है । इन दिनों ये विषय रैगर समाज में चर्चा का विषय बना हुआ है । तथाकथित जिलाध्यक्ष ने गैर-रैगर समाज के प्रत्याशी के समर्थन करने के इस मसले पर राजनीती भी खूब गर्मा गयी है । महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने तथाकथित जिलाध्यक्ष को अमान्य घोषित किया है और उस पर कार्यवाही करने बात कही है l

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अजमेर लोकसभा क्षेत्र से रैगर समाज के दो प्रत्याशी लोकसभा चुनाव लड़ रहे है और रैगर बाहुल्य क्षेत्र होने कारण दोनों रैगर प्रत्याशी भाजपा और कांग्रेस को कड़ी चुनौती दे रहे है l चुनाव जीतने की प्रबल संभावना परन्तु एक कहावत मशहूर है कि जब बाढ़ ही खेत को खाना शुरू कर दे तो उस खेत का क्या होगा ? यहाँ भी यही हुआ अखिल भारतीय रैगर महासभा के तथाकथित जिला अध्यक्ष ने कांग्रेस प्रत्याशी के समर्थन की घोषणा कर रैगर समाज की ताकत कम करने की कोशिश की l

उक्त घटना पर अखिल भारतीय रैगर महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने गैर समाज के प्रत्याशी का समर्थन करने वाले तथाकथित जिलाध्यक्ष को अमान्य घोषित किया है और कहा कि अखिल भारतीय रैगर महासभा के नाम का दुरूपयोग करने वाले  जिलाध्यक्ष पर कार्यवाही की जाएगी l उन्होंने आगे कहा कि अखिल भारतीय रैगर महासभा ने किसी भी पार्टी का कोई समर्थन नहीं किया है और ना ही किसी भी व्यक्ति को जिलाध्यक्ष बनाया है और ना ही किसी व्यक्ति को किसी भी पार्टी का समर्थन करने के लिए अधिकृत किया है l

अधिवक्ता रविन्द्र चौहान ने कहा कि अखिल भारतीय रैगर महासभा को कोई सामाजिक कार्यक्रम करना होता है तब महासभा वालो को समाज याद आता है, क्योंकि उस वक्त समाज के लोगो से चंदा लेते है l जब सामाजिक चुनाव हो तो समाज याद आता है उस समय इन्हें समाज का वोट लेना होता है और जब राजनैतिक चुनाव आते है तो गैर समाज के लोगो का समर्थन करते है l क्या ऐसे समाज के सांसद और विधायक बनते है? क्या ऐसे समाज का विकास होता है?

उक्त घटना के समर्थन और विरोध की बेला में रैगर समाज दो भागों में विभाजित हो चूका है । समाज का एक भाग जहाँ रैगर समाज के प्रत्याशियों के समर्थन में है तो वहीँ दूसरा भाग विरोध में खुलकर सामने आया है । रैगर समाज के लोगो में तथाकथित जिलाध्यक्ष के विरुद्ध रोष व्याप्त है और समाज के प्रबुद्ध लोगो ने समाजहित एक्सप्रेस के माध्यम से अखिल भारतीय रैगर महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष से मांग की है कि इस कृत्य को गलत ठहराते हुवे इस मामले में संलिप्त लोगों पर कार्यवाही की मांग की हैं ।

1968 में आँखे फिल्म आई थी जिसमें एक गीत था “ग़ैरों पे करम अपनों पे सितम, ऐ जान-ए-वफ़ा ये ज़ुल्म न कर” ये गाने के बोल रैगर समाज की वर्तमान स्थिति पर सटीक बैठते है l जो अखिल भारतीय रैगर महासभा के तथाकथित जिला अध्यक्ष ने रैगर समाज के प्रत्याशियों का समर्थन करने के बजाय गैर रैगर समाज के व्यक्ति का समर्थन किया l ऐसी विडम्बनापूर्ण स्थिति किसी भी समाज के लिए दुखदायी है l

अब देखना यह है की आने वाले चुनाव में किस प्रत्याशी का पलड़ा भारी पड़ता है ये तो आने वाला 23 मई को ही पता चलेगा, कि किसके दावे असरदार थे और किसके खोखले, परन्तु प्रत्याशियों का मुकाबला बड़ा ही दिलचस्प रहेगा l

 

 

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