समाज से बड़ा कोई नेता नहीं हो सकता, लोकतान्त्रिक समाज में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता

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दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगाँवलिया) । वर्तमान रैगर समाज की स्थिति पर विद्वान एवं तटस्थ चिंतक विचार करें। समाज दो भागो में बंट रहा है, एक ग्रुप उदारवादी, प्रगतिशील, सहिष्णु, खुले दिमाग वाले, पूर्वाग्रहहीन एवं भारत की सामासिक संस्कृति को स्वीकारने वाले। दुसरे ग्रुप में इस तरह के वे लोग हैं जो कट्टरवादी, अनुदार, हठी, बंद दिमाग वाले, रूढ़िवादी, अपने विचारों से असहमत होने वालों के प्रति अमानवीय व्यवहार करने वाले एवं उन्हें आतंकित करने वाले। समाज का नेतृत्व करने वालो को यह निश्चित करना है कि वह भविष्य की समाज को किस मार्ग पर ले जाना चाहते है ।

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आज भी समाज का नेतृत्व करने वालो की सोच में राजतंत्रात्मक दर्शन के अवशेष विद्यमान हैं । जिसके कारण हमारे सामाजिक नेता राजाओं-महाराजाओं की भाँति समाज के लोगो के साथ आचरण करते है, जैसे:- मंच पर मुकुट पहनना, म्यान से तलवार निकालकर दिखाना, रथों पर सवार होकर राजा महाराजा साबित करने की कोशिश करना । इनकी आचरण एवं करनी-कथनी में अंतर और समाज की अवहेलना, उपेक्षा, तिरस्कार एवं नफरत करना, इन्हें समाज की सेवा से अधिक समाज की संस्था रूपी सत्ता पर काबिज़ होने की चिंता है । समाज के प्रधान का लेबिल चिपकाकर अपने वोट बैंक के लिए समाज को विभाजित करने वाले दर्शन के रूप में यकीन करते है l

आजतक रैगर समाज ने जो विकास किया है, वह रैगरों की अपने अपने परिवार के प्रति दायित्व,निष्ठा एवं श्रम-शक्ति के कारण है l रैगरों ने अपनी प्रतिभा के बल पर अपना गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त किया है l मेरे मतानुसार विगत 20 वर्षो से किसी भी सामाजिक संगठन की समाज विकास में नगण्य भूमिका रही है l इस सम्बंध में आपके अलग अलग विचार हो सकते हैं ।

हमारे सामाजिक नेता मंच पर एक शब्द का प्रयोग अवश्य करते हैं। वह शब्द है, “समाज का विकास”। लगता है उनको यह शब्द उसी तरह रटाया गया है जैसे तोता पालने वाले अपने तोता को एक-दो शब्द रटा देते हैं और तोता उन रटे शब्दों का उच्चारण करता रहता है। बहस का मुद्दा चाहें कुछ भी हो, वे बार-बार “समाज का विकास” का उच्चारण जरूर करते हैं । जबकि हकीक़त ये है कि समाज विकास का एक भी कार्य नहीं करते l जिससे इनके प्रति समाज के युवा शिक्षित वर्ग की आस्था समाप्त होती जा रही है l लोकतंत्र में सामाजिक नेता की सफलता एवं स्थायित्व के लिए समाज के लोगो के मन में नेतृत्वकर्ता के प्रति यह विश्वास होना चाहिए कि उनका प्रतिनिधि ईमानदार है, विश्वसनीय है; उसके अन्दर जनसेवा की भावना है ।

समाजशास्त्रियों के मतानुसार एक लोकतान्त्रिक समाज में संवैधानिक कानून का राज होता है और किसी भी तरह से समाज को नुकसान पहुंचे, यह स्वीकार नहीं किया जा सकता l किसी को भी लोकतान्त्रिक समाज के बासिंदों की शांति और सौहार्द को मामूली चोट पहुँचाने की भी अनुमति नहीं दी जा सकती है l इसलिए हमें अपने हाथों से अपने समाज का भविष्य बनाना है। यह आपस में लड़कर नहीं, मिलजुलकर एकता से काम करने से ही सम्भव है । समाज की शक्ति को कोई पराजित नहीं कर सकता । सावधान रहे समाज विरोधी शक्तियों के लक्ष्य की सिद्धि में सहायक की भूमिका का निर्वाह नहीं करें l परमात्मा सामाजिक नेताओं को सद्बुद्धि प्रदान करे ताकि वे आत्मसात कर सकें कि समाज से बड़ा नेता नहीं  होता, नेता को समाज बनाता है । समाज में रहकर हम एक दूसरे के सुख-दुख में बराबर के भागीदार होकर अपनों पर आ रहीं परेशानियों का मिलजुल कर मुकाबला करें ।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किये है )

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