लेखक व साहित्यकार डा० पी.एन.रछौया (सेवानिवृत) से रघुबीर सिंह गाड़ेगाँवलिया के साथ सामाजिक वार्ता

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दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगाँवलिया) । साहित्य समाज का आईना होता है जिसमें समाज की कार्यप्रणाली की भूमिका परिलक्षित होती है । लेखक व साहित्यकार, भारतीय पुलिस सेवा से सेवानिवृत डा. पी.एन. रछौया, एम.ए., एल.एल.बी., एल.एल.एम., पी.एचडी.(साईबर क्राइम) एडवोकेट, राजस्थान उच्च न्यायालय से जयपुर में समाजहित एक्सप्रेस के संपादक रघुबीर सिंह गाड़ेगांवलिया ने रैगर समाज को लेकर चर्चा की l चर्चा के दौरान अखिल भारतीय रैगर महासंघ के राष्ट्रीय महासचिव नवरत्न गुसांईवाल व सचिव कालूराम चांदोलिया भी मौजूद थे l

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प्रतिभावान डा० पी.एन.रछौया का जीवन परिचय :-

डा० पी.एन.रछौया (सेवानिवृत) का जन्म वर्ष 1945 में दिल्ली में हुआ, इनकी प्रारम्भिक शिक्षा दिल्ली में हुई और दिल्ली विश्वविद्यालय से M.A.,L.L.B. की डिग्री हासिल की l बाद में राजस्थान विश्वविद्यालय से L.L.M. की डिग्री प्राप्त की l अपनी योग्यता, परिश्रम व तपस्या के उपरांत भारतीय पुलिस सेवा (IPS राजस्थान कैडर) में वर्ष 1972 से पुलिस जीवन आरम्भ हुआ l एक ईमानदार,कुशल व सफल पुलिस अधिकारी के अलावा मानवीय भावनाओं से ओतप्रोत एक सच्चे समाजसेवी और लेखक के रूप में विभिन्न विषयों में अंग्रेजी व हिंदी भाषा में कई पुस्तके लिखी और प्रकाशित हुई है l जिसमे रैगर समाज पर भी “रैगर जाति का इतिहास व संस्कृति ” और “रैगर जाति की उत्पति व सम्पूर्ण इतिहास” नामक पुस्तक लिखी है l

डॉ० रछौया ने वार्तालाप के दौरान बताया कि भारतीय सभ्यता लगभग 5 हजार वर्ष पुरानी है, इसलिये हमारा रैगर समाज भी बहुत पुराना है । रैगर समाज बहुत गहराई से धार्मिक विश्वासों से जुड़ा हुआ है; इसमें विभिन्न देवी-देवताओ और पंथों को मानने वाले लोग रहते हैं l रैगरों की सामाजिक समस्याएं भी धार्मिक व प्राचीन प्रथाओं और विश्वासों में निहित हैं । देश बड़े पैमाने पर बहुत से युद्धों का गवाह रहा हैं; बहुत से आक्रमणकारियों ने लोगो को सामाजिक-धार्मिक प्रथाओं को मानने के लिये मजबूर किया जो आज़ादी के बाद अभी भी समाज में जारी हैं । जिससे सामाजिक स्थिति बिगड़ गयी l

आज़ादी से पहले रैगर समाज में गरीबी की वो स्थिति रही है जिसमें एक परिवार जीने के लिये अपनी आधारभूत जरुरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं होता था; जैसे: खाना, वस्त्र और घर। समाज में गरीबी विशाल स्तर पर फैली हुई थी । गरीबी आज भी समाज में लगातार बनी हुई है । रैगर समाज में जहाँ अमीर और गरीब के बीच बहुत व्यापक असमानता है । इसे ध्यान में रखा जाना चाहिये l

दूषित वर्ण-व्यवस्था के चलते समाज में शिक्षा का अभाव रहा है, समाज में अशिक्षा वो समस्या रही है जिससे जुड़े बहुत से जटिल परिणाम रहे है, जैसे – आर्थिक असंतुलन, तकनीकी असंतुलन व स्वास्थ्य असंतुलन आदि । धनवानों के पास गरीबों से बेहतर शैक्षिक सुविधाएं रही और निर्धन व्यक्ति कुशलता और ज्ञान की कमी के कारण अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिये स्वंय को अकुशल मजदूर के कार्यों में शामिल रहा । पिछले कुछ दशको से शिक्षा की स्थिति को बर्बाद करने में एक प्रमुख पहलू प्राथमिक और उच्च शिक्षा के स्तर पर दोनों शिक्षा का व्यवसायीकरण है । सामाजिक नेतृत्व के शिक्षा के क्षेत्र में जागरुकता कार्यक्रमों के संचालन में बहुत अधिक शिथिलता को देखा जा सकता है ।

अशिक्षा, गरीबी व रुढ़िवादी और धार्मिक परम्पराओ को निभाने के कारण ऋण जाल में फंसा माता-पिता अपने बच्चो के सामान्य बचपन के महत्व को अपनी परेशानियों के दबाव के कारण समझने में असफल होते हैं और इस प्रकार ये बच्चों के मस्तिष्क का घटिया भावनात्मक और मानसिक संतुलन को नेतृत्व करता है l बच्चे माँ-बाप के साथ घर के पुस्तेनी कार्यों में बिना किसी वेतन के लगे होते हैं या घर से बाहर खेत में या इंट के भट्टो पर बंधुआ मजदूरी, व्यवसायिक दुकानों पर कार्य करना आदि। हमारे समाज के सामाजिक संगठनो की ओर से लोगों के बीच में जागरुकता लाने के लिये अधिक प्रयास नहीं किये गये ।

समाज में बदलाव व विकास हम सब चाहते हैं, परन्तु हर व्यक्ति बदलाव व विकास की उम्मीद किसी और व्यक्ति या समय के भरोसे का इंतजार कर रहा है l जबकि जिस परिवर्तन को हम चाहते हैं, वही परिवर्तन हम खुद हैं l रैगर समाज के सामाजिक संगठन समाज में व्याप्त धार्मिक रूढ़ियों, अंधविश्वासों और सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन की दिशा में निर्देशन करने में सक्षम है । बाबा साहब भीमराव आंबेडकर जी के द्वारा लिखित संविधान में विभिन्न अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत समाज विकास क्षेत्र में आधारिक संरचना और संसाधन उपलब्ध है l शर्त यह है कि सामाजिक संगठन निष्ठापूर्वक समाज विकास के लिए अपने कदम बढ़ाये l

लेखक व साहित्यकार डा० पी.एन.रछौया (सेवानिवृत, भारतीय पुलिस सेवा) ने रैगर समाज के प्राचीन तथ्यों को संजोकर आज के सूचना क्रान्ति के दौर मे भावी पीढ़ी के लिए स्वरचित “रैगर जाति की उत्पति व सम्पूर्ण इतिहास” नामक पुस्तक की प्रति ऑटोग्राफ के साथ समाजहित एक्सप्रेस के संपादक रघुबीर सिंह गाड़ेगांवलिया को अपने करकमलो के द्वारा सप्रेम भेट की l

 

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