रैगर समाज में निजी स्वार्थ के चलते, समाज-विकास या समाजसेवा संभव नहीं

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दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगाँवलिया) । पिछले कुछ दशकों से रैगर समाज के विकास, उत्थान हेतु समाज के महापुरुषों ने विभिन्न संगठनों के माध्यम से महत्वपूर्ण कार्य/ प्रयास शुरू किये गए थे, आज की तारीख में हम सभी में भी महापुरुषों की प्रेरणा से समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व निभाने, एकजुटता बढाने की भावना ने जन्म लिया है l परन्तु विगत दस वर्षो से रैगर समाज में यह देखकर हम अत्यंत निराश हैं कि हमारे अनुभवी मार्गदर्शक, गुरुतुल्य सामाजिक संगठनों के पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं के बीच अधिकारों, विचारों, पदोपयोग को लेकर, काफी गहमा गहमी चल रही है l सभी के बीच, ना जाने किन बातों को लेकर आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है l जो रैगर समाज के विकास में अवरोधक/बाधक तो है ही, परन्तु समाज के लोगो खासकर युवाओं को भी भ्रमित कर रहा है जो काफी समय बाद, इतनी ज़्यादा संख्या में, जोश, उत्साह के साथ अपना योगदान समाज हित में देना चाहते हैं ।

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रैगर युवाओ ने समाजहित एक्सप्रेस से वार्ता में बताया कि हम युवा रैगर समाज में, सामाजिक व धार्मिक स्तर पर राजनीति तथा कूटनीति के खेल को नहीं देखना चाहते और जैसा कि हम सभी जानते हैं, युवा ही किसी समाज की भावी दिशा तय करते हैं, हम समाज के बुजुर्गो तथा अनुभवी जनों से बस निस्वार्थ भाव से मार्गदर्शन चाहते हैं l जो कि इन अंदरूनी आपसी कलह के चलते मिल नहीं पा रहा है l इस प्रकार के कलह के कारण समाज के जागरूक सदस्यों, ख़ासकर हम युवाओं का भरोसा, सामाजिक संगठनो की नीतियों से उठ सा रहा है l कहते हैं कि संगठन में मतभेद होना लाज़िमी है, परन्तु जब लक्ष्य एक हो तब मनभेद, कभी किसी को लक्ष्य पर नहीं पहुंचाता l फिर वो चाहें समाज हित का हो, या पद अधिकार का l जब हम संगठन में पदाधिकारी चुनते है उस वक्त पदाधिकारी की योग्यता और अनुभव को ध्यानपूर्वक नहीं देखते, और अपने कर्तव्य से मुख मोड़ लेते है l चुनाव के दौरान हम उम्मीदवार के सहयोगी कार्यकर्ताओ का अनुसरण करते हैं ।  

आज का युग जो ज्ञान, विज्ञान, तकनीक तथा बौद्धिकता का युग है l कई बार समाज के युवाओं, महिलाओं के तार्किक रवैये तथा बेबाक विचारों से समाज के बुजुर्गो व अनुभवी सम्मानित जनों को बुरा भी लगता है l हम सब की सामाजिक आयोजनों तथा सोशल साइट्स पर भी यही कोशिश रहती है कि विचारों का आदान प्रदान हो, कुछ सार्थक नई सोच अपनाई जाए जिससे समाज उत्थान में हम सब अपना-अपना योगदान दें l परन्तु समाज के कई आदरणीय जनों का तो यह भी कहना है कि “अब यह युवक, युवतियां तथा महिलायें भी अपने विचार लेकर कूंद पड़ीं l”

तो क्या रैगर समाज में, युवाओं व महिलाओं को अपने विचारों तथा सुझावों को प्रस्तुत करने का अधिकार नहीं है? अगर हम तार्किक नज़रिये से चीज़ों को, समस्याओं को देखते हैं, सवाल पूछते हैं तो क्या हम गलत हैं? हमारा उद्देश्य तो यह है कि सामाजिक संगठन में समाज के पदाधिकारीगण आपस में पद व अधिकार को लेकर लड़ते न रहें तथा लक्ष्यों, साधनों में एकरूपता लाकर, समाज और युवाओं को ठीक दिशा दिखाएँ, जिससे हम सब समाजहित में जो कुछ भी विकास के लिए कार्य करने का प्रयास करें, वो समाजहित में सार्थक प्रतीत हों l समाज के लोग और युवा सामाजिक विकास और समाज में एकता देखना चाहते हैं l

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