रैगर समाज की सामाजिक दिशा और दशा पर साहित्यकार, कवि विनोद कुमार गहनोलिया का लेख

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दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगांवलिया) l वर्तमान में अनेक प्रकार की सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक-भौगोलिक-ऐतिहासिक और अन्याय व शोषण की समस्याऐं रैगर समाज के सामने उपस्थित हैं l  अनेक समस्याओं को लेखक और पत्रकार अपनी सशक्त लेखनी के माध्यम से निर्भीक और स्वतंत्र होकर समाज, राज्य व देश के सामने उपस्थित करते हैं, ताकि समाज और देश के शासन-प्रशासन में जिम्मेदार नागरिकों में जन-जागरूकता और सतर्कता का प्रसार हो, और वे अपनी जिम्मेदारी को बखूबी समझें और अपने कार्यों को और बेहतर कर सकें | निर्भीक लेखको और पत्रकारो के ऐसे कार्यों में समाज के प्रबुद्ध लोगों को सहयोग करना चाहिये ।

रैगर समाज के प्रत्येक कवि, साहित्यकार और पत्रकार ने अपने जीवन में कभी न कभी, किसी न किसी रूप में जातिगत अन्याय, अपमान और उपेक्षा का दंश झेला है । दर्द के साथ इन लेखको का रिश्ता जन्म से है । इतिहास गवाह है कि साहित्यकार और पत्रकारों के लेखन ने, जब जब समाज, राज्य व देश में कुछ घटित होता है तो अपनी लेखनी से समाज की प्रतिष्ठा और नीति-नियम के प्रति अपना पावन कर्तव्य बड़ी कर्मठता से निभाते रहे हैं | साहित्यकार और कवि विनोद कुमार गहनोलिया ने भी समाज की सामाजिक दिशा और दशा पर अपनी लेखनी के द्वारा समाजहित में लेख लिखकर विचार व्यक्त किये है :-

सामाजिक दिशा और दशा :

ऐसा देखने में लगा है कि रैगर समाज के सामाजिक संगठनों में एक हुडदंगी ग्रुप तैयार हो गया है जो पूर्व नियोजित तरीके से हरेक प्रोग्राम में हुडदंग करने का आयोजन करते हैं । ऐसे होगा सामाजिक एकता एवं विकास ? सामाजिक संगठनों को राजनीतिक अखाड़ा बना दिया गया है । एक पक्ष कांग्रेस तो दूसरा बीजेपी तो तीसरा किसी अन्य से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है । संगठनों के पदाधिकारी संगठन को राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करने का साधन समझ कर संगठनों पर कब्जा जमाने में लगे रहते हैं ताकि TRP हाई बन सके ।

सवाल यह है कि जब विरोधी संगठन के प्रोग्राम को फैल करते हैं तब जब दूसरे पक्ष की बारी आती है तब वो भी कसर नहीं छोड़ते हैं । कोर्ट केस, नोटिस, खिलाफत, एवं हो हल्ला, हुड़दंग करना, करवाना आम बात हो गयी है । समाज हित, सेवा कार्य, सामाजिक विकास करना एक दिखावा मात्र रह गया है । ऐसे में क्या कोई संगठन सामाजिक एकता का परिचय दे सकता है ? शायद नहीं । जब समाज का प्रबुद्ध वर्ग ईर्ष्या, द्वेष, विरोधबाजी, अदूरदर्षिता ग्रसित हो, जिनका न कोई विजन हो और न समग्र सोच हो उस समाज का भविष्य कैसा होगा, कल्पनातीत है । हां एकल विकास तो स्वयं के प्रयास से हो सकता जब परिस्थितियां सामान्य हो लेकिन समग्र विकास और परिस्थितियाँ असामान्य हो तो कल्पना से परे की बात होगी । अब आने वाले समय में परिस्थितियाँ असामान्य होती दिखाई दे रही हैं,जिस प्रकार की हवा बहने लगी है उसमें अंधकार दिखाई देता है जिससे मुकाबला करने में हमारे शीर्ष संगठन की दिशा व सामाजिक सोच पिछड़ती नजर आती है । इसका मतलब यह किसी एक कार्यकाल का आकलन करना नहीं है बल्कि विगत का परिदृश्य भी शामिल है ।

ऐसे में क्या किया जा सकता है :-

– ईर्ष्या, अहम व द्वेष छोड़ आपसी प्रेम और भाईचारे को बढ़ाया जावे ।

– समर्पण भाव को बढाने हेतु आगे आना चाहिए ।

– संगठन में सभी प्रबुद्ध विचारको, कुटनितिज्ञो, लेखकों रणनीतिकारों को शामिल कर मंडल गठित किया जावे ।

– मुखियाओं के व्यवहार से वैर भाव नहीं झलकना चाहिए ।

– और क्या यदि इसी प्रकार बिखराव, अलगाव जारी रहता है तो सदस्यता त्याग देनी चाहिए ?

यह मेरे निजी विचार हैं एवं किसी पर दोषारोपण करने की दृष्टि से व्यक्त नहीं किये गये हैं । सामाजिक संगठन को और मजबूत, शक्तिशाली बनाने हेतु सुझाव आमंत्रित किए जाते हैं । अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार सभी को है ।

सोच बदलो, समाज व देश बदलेगा ।

जय हिन्द ।

विनोद कुमार (गहनोलिया)

जयपुर

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